Mar 26, 2016

क्या करें नुमाया कर गए


आजकल मेरी लड़ाई चल रही मेरी कलम से..जब भी दिल में जज्बातों की आंधियां उठती हैं..डायरी की तरफ देखती हूँ..फिर पेन छुपा देती हु..चादर ओढ़ कर छुपना चाहती हूँ खुद से, अपनी कलम से और उन आँधियों से भी जो मुझे मन का गुबार कागज़ पे उतारने के लिए मजबूर करना चाहती हैं..

हो तो गया जो होना था..या शायद वही नहीं हो पाया..बचपन में एक शिक्षक से सुना था..ओ मेरे अहबाब क्या करें नुमाया कर गए..बी ए  हुए नौकर हुए ..पेंशन मिली और मर गए..
..बड़े होने पर एहसास हुआ हमारे दौर में ये बी ए होने से नौकर बन जाने की काबिलियत नहीं आती..सन २००४..फ़ाइनल एक्जाम का समय..ध्यान किताबों से ज्यादा न्यूज़ पेपर के जॉब्स वाले पन्नो पर रहता था. ..फिर शुरू एक नया दौर संघर्ष का..संघर्ष पहले भी था लेकिन आयाम दुसरे थे..स्कालरशिप की टेंशन..पापा के मनी आर्डर की टेंशन, मासिक और त्रैमासिक परीक्षाओं के नम्बर..पॉकेट मनी के लिए ट्यूशन वगैरह..लेकिन स्कालरशिप आते ही बहार आ जाती थी..
नौकरी की जद्दोजहद कुछ अजब होती है..इसका आपके स्कूल और कॉलेज इम्तहान में अव्वल आने से कोई सरोकार नहीं..प्राइवेट नौकरियों के साक्षात्कार में स्मार्ट दिखना जरुरी था, स्मार्ट बोलना जरुरी था..क्या आता है वो महत्वपूर्ण नहीं, किस तरह खुद को प्रेजेंट कर पाते हैं ये जरुरी था. .सिर्फ ग्रेजुएट होना भी काफी नहीं था..कोई अता पता भी नहीं..ये भी नहीं की क्या जॉब चाहिए..किताबो से परे की दुनिया में झाँक कर देखा कहाँ था कभी..
फिर उस जद्दो जहद को थोडा और टाल दिया..
पापा ने पुछा अब क्या करना है..आईएस की तैयारी करो..दिम्माग चकरा गया..आईएस..हे भगवान्..पढ़ाई की थी मैंने लेकिन..सिविल्स तो कभी भी एजेंडा था ही नहीं..भूगोल स्नातक की किताबों से तभी तक सर खपाती थी जब तक क्लास और असाइनमेंट की तैयारी होती थी..फिर तो मिरांडा हाउस की सपनो से भी सुन्दर लाइब्रेरी में दीवान पर अधलेटी हो..कहानियों और कविताओं में ऐसी खो जाती थी की कब लंच के बाद वाली क्लास छूटी, कब ५ बज गए ये तब पता चलता जब सामने लाइब्रेरियन आकर पूछती जाना नहीं है क्या..
लेकिन एम ए करते वक़्त ये अहसास हो गया था की बिना जॉब ढूंढे कोई चारा नहीं ..कहानियां किताबे पढ़ के जिस रंगीन दुनिया में खो जाने का मन करता था , उसका धरातल अर्थ पर टिका था..विश्वविद्यालय में टिके रहने के लिए भी अर्थ चाहिए था..और समय भी..फिलहाल मेरे पास दोनों ,में से कुछ भी नहीं था..
फिर नौकरी भी की और कहानियां भी पढ़ती रही..जान बुझ कर पत्रकारिता का रास्ता चुना ताकि किताबों से जुड़े रहने का कुछ तो अहसास हो..हालाँकि न्यूज़ एडिट करते वक़्त वो सारी सपनो की दुनिया बहुत दूर नजर आती थी. कॉमा, पूर्णविराम और नरेशन में उलझ कर , सुरेन्द्र वर्मा की "मुझे चाँद चाहिए" मुंह चिढाती नजर आती..
लगता था कहीं और कहीं और जाना था मुझे..
बड़ी अच्छी कविता है एक..सबसे बुरा सपना होता है सपनों का मर जाना....शुक्र खुदा का मेरे सपने मरे नहीं...जिन्दगी चाहे कितनी भी उलझी हो...हर बार फोएनिक्स की तरह उठ कड़ी होती हैं महत्वाकंछायें...चैन से सोने नहीं देतीं....और ये कलम..चाहे इसे कितना भी भी छुपाऊं..कमबख्त दबोच ही लेती हैं आखिर मुझे..
चाहे कितनी भी दुश्मनी कर लू..अंत में फिर वही कलम बन जाती है.गवाह .अहसासों और कागज के पन्नो के बीच ..पिघल गए शब्दों के वजूद का..तो क्या हुआ कि बी ए हुए और एम् फिल हुए..नौकरी भी कर ली..अभी भी कुछ और और कहीं और का जूनून बाकी रहेगा..हर जद्दोज़हद के साथ,..इस कलम के साथ..

Nov 17, 2015

आदत

वो आये मेरे पास
फूलों की सौगात लेते हुए..
ये तो उनकी आदत है..
मुस्कराते हैं वो
 मुस्कराहट देते हुए..
ये तो उनकी आदत है..
वो जो फूल सजा जाते हैं
उनके नीचे हम कांटे छुपा देते हैं..
क्या करे आदत है..
हम कांटो सा चुभ जाते हैं..
कसक कर उनको भी रुला जाते हैं..
ये हमारी आदत है..

Nov 4, 2015

आसंग

तुम्हारे कमरे में
हर चीज अपनी लगती है...
गन्दी चादर...
टेबल पर राखी बेतरतीब किताबे ..
कुर्सी पर पड़े तुम्हारे उलटे मौजे ...
किचन में जूठी चाय की प्यालियाँ और थालियाँ..
और अभी अभी उतारी तुम्हारी शर्ट,
जिसमे तुम्हारे पसीने की गंध भी है..
                                         
                        हाँ, मुझे अहसास है कि ये मेरा कमरा नहीं..
                         कि वक्त ढलने से पहले मुझे चले जाना है...
                          की घडी की सुइयां हमेशा डिगाती रहती हैं,
                           यहाँ के अपनेपन को अपनी रफ़्तार से .
                       
फिर भी कुछ पल के लिए मैं भूल जाती हूँ ..
मेरी नजर डूब जाती है..चीजों को करीने से रखने की होड़ में ..
हर धुल भरे कोने में ढूँढने लगती हूँ मैं अपना नाम
जब फ़ैल जाती हैं तुम्हारी पनीली आँखें कुछ पल के लिए..
तुम्हारे कमरे की तरह..
और इस कमरे की हर चीज मेरी अपनी लगने लगती है..
तो मैं भूल जाती हूँ..और सब बातें ...
घडी की टिकटिक  और चीजों के बेगानेपन को ..
और सुबह से शाम की उहापोह को..
तुम्हारी आँखों का पानी पी जाता है...

Sep 27, 2015

एक अनजान चाहत के लिए..

दिन को खुद से गुजरना था.
.मैंने भी खुद को गुजार दिया दिन की तरह..
नहीं मालूम तुम्हारी उदासी का सबब क्या है..
आजकल दिल तुमसे पूछकर उदास होना चाहता है..

Feb 4, 2015

दू बटा दू के जिनगी

दू बटा  दू के जिनगी

ई फ्लैट नंबर वाला दोस्त सभ 
....ई शहर केर जिनगी दू बटा दू सन....

ने कोनो नाम छैक लतामक गाछ के
ने नबकी काकी केर गाईर सुनि होइत छैक एतय भोर 
 ने लालकाकी केर मेही पिरिकिया भेटत एतय 
ने पुर्णी पोखैर केर मखान आ माछक झोर
 रहैत  तय छी कतेको बरख सं मुदा एखनो एही शहर के नहि छी हम  
परिजन के छोड़ी  छाईर जीबैत छी टुगर टापर जकां
जाहि गाम के बिसरि  बैसल छी आन लोक  बनिकय  कहिया सं 
सर्टिफिकेट  में देखबैत छी स्थायी निवास कहि कय 

काल्हि कियो फ़ोन कय क पूछलक कि घरक लोक के समाचार कहू  
सोचय लगलाऊ जे घर तय छुटि गेल पाछा गामे में
एतय देवालक ओट में जीबैत छि दीवार बनिकय.... 



Apr 19, 2014

मैं तुमसे दूर जाना चाहती हूँ

मैं तुमसे दूर जाना चाहती हूँ
भूल जाना चाहती हूँ
कि मेरी हर बात में हो तुम
तुम, तुम्हारी बातें, तुम्हारा हँसना, तुम्हारा रोना,
तुम्हारा उत्तेजित होना और तुम्हारी सहनुभूतियाँ
जो हर कमजोर नस्ल के लिए उभरती थीं
उनमे से कुछ भी अब मेरे सामने नहीं..
और मैं चाहती भी नहीं इन चीजों को
अपने आसपास
मैं  भूल जाना चाहती हूँ हर चीज को
मापने का तुम्हारा पैमाना..
और हर अहसास को जीने का तुम्हारा नजरिया
..शुक्रगुजार हूँ कि तुमने
उन रिश्तो को दिया है एक नया मोड़
जिन्हें मंजिल तक ले जाना
मुमकिन न था
और उन तमाम बातों के लिए
जो तुम्हारी वज़ह से मेरे जीने का सबब बनी हैं
पर उन तमाम खुशियों, '
हसरतों और चीजों के साथ साथ
अपनी यादें भी क्यों नहीं ले लेते वापस
क्यों मेरी तमाम जीने की कोशिशों को
तमाचा मार देती है तुम्हारी गैर मौजूदगी
निकाल ले जाओ अपनी परछाई मेरी रूह से
मैं हर उस चीज को भूल जाना चाहती हूँ
जिसपर तेरा नाम लिखा है..
हाँ मैं तुमसे दूर जाना चाहती हूँ.

हिसाब ले लो

गम इस बात का नहीं की तुम यहाँ नहीं हो
इसका है की हर बात में मौजूद रहता है तुम्हारे न होने का अहसास
और हर वक़्त यही लगता है कि मैं खुद को नहीं
तुम्हारे गायबाने को जीती हूँ..

मेरी जिन्दगी बन गयी है  तुम्हारे खालीपन का अक्स
उसी अक्स को मैं अपने आइनों में भर लेती हूँ
तुम्हारा प्यार, तुम्हारे दिए ग़मों के तोहफे और तुम्हारी यादें
भारी पड़ने लगे हैं मेरे हर आने वाले लम्हे पर

तुम्हारे सपनों को जज्ब किये लेती हूँ अपनी हसरतों में
ये फेहरिस्त बड़ी है आंसू भरी बातो की,
ज़रा हिसाब ले लो कितनी राते हैं
तुम्हारे जज्बातों और मेरी अकेली रातों की..


Apr 18, 2014

एक प्रेम पत्र: रसायन की प्रयोगशाला से

मेरी प्यारी ऑक्सीजन
अब मै दीवानगी शब्द का मतलब भी समझ गया हूँ ..साइंस की किताब के पन्नो में भी तुम समाई  लगती हो..और उसकी बातों में भी..मेरा यह परवाना तुम्हे मेरे दिल की हालत बयां कर देगा. दिन के चौबीस घंटों में छः घंटे सोने के निकाल कर बाकी अठारह घंटे इसी माइनस प्लस के समीकरण में बीत जाते हैं की तुम मुझसे और मै तुमसे कितना प्यार करता हूँ..और फिर एक नए सिरे से इस में अपना पलड़ा भारी करने में लग जाता हूँ..ये क्या होता जा रहा मुझे  ..तुमने प्रेम की ऐसी मधुर बंशी बजा कर मुझे मोहित तो आकर दिया फिर अब प्रेम निकुंज में घटाओं के बदले ये ग्रीष्म का आतप क्यों...
तुम्हारा प्यार मेरी जिन्दगी का वो एलिमेंट है जिसमे कोई मिलावट नहीं..तुम्हारी एक एक गतिविधि का रिएक्शन मुझ पर इतना फ़ास्ट होता है जैसे मग्निशियम का फीता ऑक्सीजन पाकर जलने लगे..
जब तुम्हारी नरमियत महसूस होती है तो एक कार्बनिक पदार्थ की तरह  मेरे तन बदन में प्यार का सलूशन घुलने लगता है..पर तुम्हारी थोड़ी से भी बेरुखी और तल्खियत उस प्यार को कपूर की तरह उर्ध्व्पातित कर देता है.. और मोह ऐसे भंग होता है जैसे एलेक्ट्रोल्य्सिस के बाद पानी से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन विस्थापित हो रहे हों..
पर ये विस्थापन और अक्रियाशीलता भी क्षणभंगुर है नॉन-मेटल्स की तरह ..उस चेन रिएक्शन का रिजल्ट भी मोह ही उपजाता है..और फिर मेरे होठों पर तुम्हारा ही नाम आता है  उच्चतम परावर्तक फलक बनकर बिलकुल हीरे की तरह.
इसीलिए पल-पल तुमसे प्यार करने और न करने की मेरी आदत अब चेन रिएक्शन बन कर रह गयी है जहाँ रेअक्टेंट ही प्रोडक्ट बन जाता है..एक चक्र सा चलता रहता है..
फलस्वरूप, प्यार का फुल अमाउंट अब तुम्हारे इनेर्टनेस  से न तो घटता है न बढ़ता है..और पहले की तरह मै तुम्हारा दीवाना तुमसे पयार करता आ रहा हूँ..
तुम्हारा कार्बन -डै ऑक्साइड .
१८ जून , १९९८

तुम्हारी याद

तुम्हारी याद आएगी--
जिन्दगी के हर छोर तक,
सागर की गहराइयों तक
नभ की उंचाई तक
और यादों की सीमा तक.

तुम्हारा साथ---
हर पल पाने को जी चाहेगा
और फिर याद आएगी
तुमसे जुदाई---
जिसके लिए हम मिले थे,
एक हुए थे
और
अपने अपने दर्द को बांटा था..
-उस पल के आने पर
कितने ग़मगीन थे
तुम्हारे गायबाने में
यह मैंने जाना था.

बदलते आयाम

जब पास की पहाड़ी से गुजरती, ढोर-डंगर चराती बंजारनो को देखती हूँ तो मुझे निचले मैदान का वो फैलाव याद आता है...बांस के वो झुरमुट मुस्कराने लगते हैं, जिनमे छुप डूबने लगती थीं जल्दी ही किरणें, ह्रदय में शूल की तरह बिंधने लगती थी आम की मंजरियों के बीच कोयल की कूक और एक व्यंग्य सा लगता था पपीहे का विरह गायन!
...मैं ऊँचाई और आसमान खोजती थी, जबकि आँखें हरियाली में जी भर कर डुबकियाँ लगाने लगतीं, मै चट्टानों की कठोरता चाहती. मिअदानी दिलों की नरमियत मेरे गले में हड्डी की तरह अटक जाती थी...
मांझी की चल चल की तेर भी जब नहीं लुभा पायीं मेरी ख्वाहिशों को तो खुदा ने भी उन्हें बख्श दिया और अब -मेरी ख्वाहिशें अंजाम में तब्दील हुईं--

नदी का रास्ता कुछ टेढ़ा हो गया अचानक,
और नावें खो गयीं उसकी पुराणी चल में,
लड़खड़ाने लगी धार गुनगुनाहट को छोड़ कर---
ऊंची -नीची जमीन पर.

आँखों का स्वप्न बदला. सामने नहीं थे अब बासंती मंजर, जिनमे डोला करता था अमराई का पत्ता पत्ता. अब धुन्धती रहती हूँ मैं पत्थर के एक-एक टुकड़े में आवाज..कृष्णा नदी की चौड़ी छाती पर आलमाटी बाँध का पानी कहर बन कर गरजता रहता है लगातार..जिसे देख भर लेता है मुस्करा कर ऊपर से गुजरता बादलों का काफिला. बांध की ओर से आनेवाली सर्द हवाएं अपनी फुहारों से देना चाहती हैं रिमझिम बारिश की तृप्ति.

आह..अब मेरा मन ढूंढता फिर रहा नाखुदा को, तड़पना चाह रही हूँ मैं भवरों के बीच सफीना बनने के लिए, उलझने लगी हूँ कैक्टस के कांटो से गुलाबों की खोज में..जाने क्यों ये नंगे पहाड़ अहसास देने लगे हैं --मैदान ही था आकश का दूसरा छोर शायद...!
१९ सितम्बर १९९७.
जवाहर नवोदय विद्यालय, आलमाटी
बीजापुर, कर्नाटक