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Showing posts from September, 2026

पुनर्मृत्यु

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कोशिशें तुम्हारे गायबाने में हर चीज फिर से करने की वो जज़्बात ओ बातें ओर हरकतें वो शरारत री लिव करना किसी ओर की बातों में  पुनर्जन्म नहीं...  पुनर्मृत्यु जैसा है... फिर भी देखो हिम्मतें मेरी आज फिर से जीते हैं आज फिर से मरते हैं...

तुम सिर्फ एक प्रोप

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जिंदगी की बिसातें बैठी हुई हैं शतरंज की तरह मैं तुम वह ओर वे सारे लोग सिर्फ एक प्रोप....! मेरी कहानियों में तुम कहीं नहीं जो अब अंदर जो ज्वार उमड़ता है हर चीज हर बात ओर हर इंसान के साथ तुलनात्मक अध्ययन का  उसमें तुम सिर्फ एक पैमाना बन कर फ्लैशबैक में गुजर जाते हो...  हां कहानियां वही हैं, सड़क।पर चलते हुए  साथ भागमभाग की, दोसे के अंदर के आलू गायब  होने की  ओर नारियल पानी पीते वक्त स्ट्रॉ फेंकने की मगर तुम अब सिर्फ एक प्रोप बन जाते हो... हल्की हल्की बूंदों में मिट्टी की सोंधी महक चीखती है  उस ओर खींचती है खिड़कियों के  भूले बिसरे पर्दे में वो तमाम झलकियां मगर कहीं भी तुम नहीं सिर्फ तुम्हारा नाम एक प्रोप....

नींद भी ओर चैन भी

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इश्क़ में नींद उड़ जाती है ओर चैन भी ये बहुत के मुंह से सुना था। पता नहीं ये वाला इश्क़ कौन सा होता है मुझे तो इतनी नींद आती है कि शायद इश्क़ का स्कोप ही नहीं बचता। बहुत दिन पहले किसी ने मुझे भस्मासुर कहा सिर्फ इसलिए कि मैं 8 बजे शाम में ही सो गई थी। अब कैसे बताएं कि हम बिहार के जिस गांव से हैं वहां तो 8 बजे रात हो चुकी होती थी। लोग खाना खा कर चूल्हे की आग भी बुझा चुके होते थे।  हालांकि हमारे गांव में 4 बजे सुबह सुबह इतनी चहल पहल हो जाती है जितनी दिल्ली में 11 बजे तक भी न होती।  वहाँ तो पौ फटते ही किसान अपने खेतों की ओर बढ़ जाते ओर घर की औरतें राख से चूल्हा लीप कर कम काज की शुरुआत कर चुकी होती। गाय बैल को सानी पानी  देना, स्कूली बच्चों के लिए नाश्ता ओर टिफिन पैक करना सब इसी वक़्त होता ओर साढ़े छह बजे तो हम लोग स्कूल भागते होते थे। देश के पूर्वी हिस्से में सब कुछ जल्दी जल्दी होता है सुबह भी ओर शाम भी । तब कहा पता था 4 बजे सुबह उतने की आदत दिल्ली में इतनी बोरिंग लगने लगेगी।  अब तो सुबह 2 घंटे का समय इतना ज्यादा फ्री लगने लगता है। कभी उठ कर किचन में जाती हूं तो ल...