Nov 11, 2010

कलम

फिर खड़ी हूँ उसी बियाबान उजाढ़  में 
अँधेरे  जंगल में 
खामोश अँधेरे को झेलती 
थरथराती पुकारती अपनी कलम को
--लौट आ
मेरी वेदना ले
तू अपने पिघले अक्षरों में समेट
मह बन गयी हूँ  मुझे बरसने दे आज
ओ मेरी कलम
-- भरी है बहुत पीड़ा जीवन के पन्नो में
समेट ले आ-- या बिखर जाने दे आज.

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