Apr 11, 2012

कुछ कह दो..

कुछ कह दो..हवाएं सुन लेंगीं..
शब्दों के सतरंगे इन्द्रधनुष फैला दो..मेरी आँखें चुन लेंगी..
न  अजनबी कोई न यहाँ अपना.. कोई परिचय जरुरी नहीं..
ये सिर्फ थरथराती भावनाओं का शहर है..
बिखड़ जाने दो..कोई रिश्ता खुद ही ढूँढ लेंगी..
इन बहते पलों का हिसाब ही लिख दो..
बेचैन साँसे उन्हें नज़्म में बुन लेंगीं

1 comment:

Gpriya said...

अजय कुमार..
आप खुद इतनी अच्छी कविता लिखते हैं..