एक बीमार स्त्री का प्रेम
एक बीमार स्त्री प्रेम करने का दावा नहीं कर सकती
क्यूंकि उसका प्रेम प्रदर्शित नहीं हो सकता
वह उम्मीद नहीं कर सकती प्रेम के बदले प्रेम का
उसकी भावनाएं अनापेक्षित हैं
बदले में मिल।सकती हैं सिर्फ सहानुभूति
ओर सांत्वना के दो चार शब्द
अक्सर उसका प्रेम जटिलताओं में उलझ कर रह जाता है
किंकर्तव्यविमूढ़ सा
कभी आंखों तक आकर कोने से ढुलक जाता है
दिल के किसी कोने में दबी राख सा सुलगता
उसकी पेशानी की शिकन में,
उसके सफेद होते बाल में
ओर लाल हुई आंखों में फिर वो प्रेम रिस रिस कर
हमेशा की तरह उसका प्रेम अधूरा रह जाता है
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