उस आखिरी वक़्त मौत मुझे बख्शेगी नहीं ... मैंने तमाम उम्र जिन्दगी से बेवफाई जो की है ..
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नैहर
टूटी फूटी उस झोपडी में रहती थी एक नन्ही सी बच्ची दूर एक कस्बे में रेलवे लाइन के किनारे रोज निहारती थी सुबह जाने वाली रेलगाड़ियों को ओर अपने एक हाथ से खिड़की को पकड़े दूसरे हाथ से टा टा करती थी ट्रेन को रोज हंसती थी उसकी मां सवेरे सवेरे बेटी को टा टा करते देख गुजरती ट्रेन के मुसाफिर उस बच्ची को शायद देख भी नहीं पाते थे या बस यूं ही गुजर जाते थे पर उसका पिता रोज दुआ करता था आज कोई मुसाफिर उसकी बच्ची के टा टा करने पर वापस हाथ हिला दे ट्रेन की खिड़की से धीरे धीरे दिन बीतते गए छोटी सी बच्ची इतनी बड़ी हो गई कि खिड़कियों पर चढ़ कर टाटा करने से बहुत ज्यादा बड़ी दूर किसी शहर में पढ़ती है अब वो बच्ची ओर उसके पिता अब इतने बूढ़े चुपचाप खिड़की पर बैठे रोज देखते हैं आने जाने वाली ट्रेनों को ओर हाथ हिलाते हैं हर ट्रेन के मुसाफिरों को अब भी वो रोज कि कोई मुसाफिर आते जाते उनको देख कर वापस मुस्करा दे ओर एक बार टाटा कहकर हाथ हिला दे@gunjanpriya
जब से तुम गए हो
जब से तुम गए हो .... हां मैने अब इस बात को स्वीकार कर लिया है कि दो समानांतर रेखाएं मिल नहीं सकतीं मैने मान लिया है कि कुछ रिश्तों की रिप्लेसमेंट नहीं होती और जिंदगी का आखिरी मुकाम एक अनंत तलाश नहीं हो सकती जैसा तुम मानते हो/ थे बड़े आराम से हर बार अपने बे असूल जिंदगी में जौन इलिया को दोहरा देते थे कि तुम्हारी ही तमन्ना क्यों करें हम अब तो मैने ये भी मान लिया है कि 21वीं सदी में मुकम्मल जिंदगी ओर इश्क के सपने दोनों ही सिरे से गायब हो चुके हैं अब लोग कार्प दियाम ओर क्षण में जीने का दम भरते हैं बहुत ही अभिमान के साथ ओर जाते जाते तुम ये भी अहसास करवा गए हो कि मेरी खुशफहमियों की सारी चाबियां मेरे ही पास हैं अब अपनी रफ्तार में किसी पिलियन के शरीक होने की दरकार नहीं

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