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पुनर्मृत्यु

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कोशिशें तुम्हारे गायबाने में हर चीज फिर से करने की वो जज़्बात ओ बातें ओर हरकतें वो शरारत री लिव करना किसी ओर की बातों में  पुनर्जन्म नहीं...  पुनर्मृत्यु जैसा है... फिर भी देखो हिम्मतें मेरी आज फिर से जीते हैं आज फिर से मरते हैं...

तुम सिर्फ एक प्रोप

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जिंदगी की बिसातें बैठी हुई हैं शतरंज की तरह मैं तुम वह ओर वे सारे लोग सिर्फ एक प्रोप....! मेरी कहानियों में तुम कहीं नहीं जो अब अंदर जो ज्वार उमड़ता है हर चीज हर बात ओर हर इंसान के साथ तुलनात्मक अध्ययन का  उसमें तुम सिर्फ एक पैमाना बन कर फ्लैशबैक में गुजर जाते हो...  हां कहानियां वही हैं, सड़क।पर चलते हुए  साथ भागमभाग की, दोसे के अंदर के आलू गायब  होने की  ओर नारियल पानी पीते वक्त स्ट्रॉ फेंकने की मगर तुम अब सिर्फ एक प्रोप बन जाते हो... हल्की हल्की बूंदों में मिट्टी की सोंधी महक चीखती है  उस ओर खींचती है खिड़कियों के  भूले बिसरे पर्दे में वो तमाम झलकियां मगर कहीं भी तुम नहीं सिर्फ तुम्हारा नाम एक प्रोप....

नींद भी ओर चैन भी

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इश्क़ में नींद उड़ जाती है ओर चैन भी ये बहुत के मुंह से सुना था। पता नहीं ये वाला इश्क़ कौन सा होता है मुझे तो इतनी नींद आती है कि शायद इश्क़ का स्कोप ही नहीं बचता। बहुत दिन पहले किसी ने मुझे भस्मासुर कहा सिर्फ इसलिए कि मैं 8 बजे शाम में ही सो गई थी। अब कैसे बताएं कि हम बिहार के जिस गांव से हैं वहां तो 8 बजे रात हो चुकी होती थी। लोग खाना खा कर चूल्हे की आग भी बुझा चुके होते थे।  हालांकि हमारे गांव में 4 बजे सुबह सुबह इतनी चहल पहल हो जाती है जितनी दिल्ली में 11 बजे तक भी न होती।  वहाँ तो पौ फटते ही किसान अपने खेतों की ओर बढ़ जाते ओर घर की औरतें राख से चूल्हा लीप कर कम काज की शुरुआत कर चुकी होती। गाय बैल को सानी पानी  देना, स्कूली बच्चों के लिए नाश्ता ओर टिफिन पैक करना सब इसी वक़्त होता ओर साढ़े छह बजे तो हम लोग स्कूल भागते होते थे। देश के पूर्वी हिस्से में सब कुछ जल्दी जल्दी होता है सुबह भी ओर शाम भी । तब कहा पता था 4 बजे सुबह उतने की आदत दिल्ली में इतनी बोरिंग लगने लगेगी।  अब तो सुबह 2 घंटे का समय इतना ज्यादा फ्री लगने लगता है। कभी उठ कर किचन में जाती हूं तो ल...

ब्लॉग या व लॉग

बहुत दिनों के बाद जब वापस कलम उठाई तो लगा जैसे बीच में एक सदी गुजर गई है। एक्चुअली शुरुआत ही गलत हो गई मैने कलम नहीं उठाई। मैने कंप्यूटर ऑन किया ओर स्क्रीन पर कीबोर्ड के सहारे लिखना शुरू किया । अब कलम नहीं थम्ब है अंगूठा जिससे आप लिखते होते हैं अपने फोन पर। कंप्यूटर या लैपटॉप तक भी जाने की जहमत कौन करे। सच पूछो तो मेरी गर्दन के दर्द का  सारा झमेला इन अंगूठा के बीच दबे उस मोबाइल का किया धरा है। लेकिन सुबह के पांच बजे उठकर टेबल चेयर पर बैठ जाऊं ओर लैपटॉप निकाल कर लिखने लागू क्या मै इतनी कर्तव्यपरायण जागरूक इंसान हो सकती हूं ? हाहाहाहा  ऐसा होता तो वो जो एम ए पत्रकारिता का कोर्स मैने 2007 में डिप्लोमा करने के बाद सोचा था वो अब तक पूरा हो जाता। हर बार एम ए का फॉर्म भर कर, फीस भर कर बड़े उत्साह के साथ शुरू तो जरूर करती हूं मगर फिर में बीच में कुछ ऐसा लगता है कि जिंदगी की बागडोर हाथ से फिसलती नजर आने लगती है।  वैसे बात लिखने की हो।रही थी । मै सवेरे सवेरे इतनी।सेल्फ क्रिटिसिजम का शिकार नहीं होना चाहती। छुट्टी का दिन है, प्रोंतो ऐप से सफाई कार्यक्रम का निपटारा तय हो चुका ओर यस मै...

बेतकल्लुफ

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 चलो हटो घटा नभ की मुलाकातों का जिक्र बहुत हो गया  फूल भी चुन लिए तुमने गुलाबों का हिसाब भी बहुत हो गया अब दाल बनाते हैं तुम जरा तड़के का इंतजाम करो ये इश्क़ नहीं रोजमर्रा की जिंदगी है चलो ऑफिस जाओ ओर काम करो

राह में

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आरज़ू तो यही थी कि  मुकम्मल इश्क़ मिले या ख़ुदा  मगर बीच में आ मिले अनगढ़ राह के पत्थर से तुम...  न तुम्हे इश्क़ आता है न ख़ुदाई 

यहां पर बस शान्ति शांति है

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मार धाड़, ट्रैफिक हड़ताल, भीड़, चोर, पुलिस ओर कुछ बवाल भी टीवी, रेडियो चीख चीख पूछ रहे सवाल भी  हम मगर ऑफिस जाएंगे  यहां पर बस शान्ति शांति है...  शेयर गिरा, सोना उछला, चांदी गई तरी पार सब्जी दूध गायब गायब हो गए बंद है बाजार  छोड़ दो स्कूल अब बोर्ड ओर इम्तिहाँ  हम मगर ऑफिस जाएंगे  यहां पर बस शान्ति शांति है  बच्चे भूखे जंतर मंतर पर, नेता सारे टूर पर डंडा लेके भागी पुलिस, खूब मचा दी भगदड़ साधु संत सम्हाले कुर्सी, जनता सारी रोड पर हम मगर ऑफिस जाएंगे  चाय पियेंगे , फाइल बनाएंगे  यहां पर बस शान्ति शांति है...