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नवदुर्गा का अवतार आज की औरत

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 वो खींच के लगाती है काजल,  उम्र को एक हाथ से जकड़ते हुए,  दूसरे हाथ में आरती का थाल,  परंपराओं की डोर  ओर कंप्यूटर का की पैड थामे,  सहस्र भुजाओं से संभालती  पृथ्वी के बनते बिगड़ते समीकरण  ओर जमीं पर हल्की सी थाप दे,  मुस्कराती है मंद मंद,  ताप, शीत सहते हुए,  वर्जनाएं, कटूक्तियाँ किनार कर  अपने आंचल से, दिये की लौ सी  अपने बच्चे को थाम कर  हाथ आगे बढ़ा देती है... आज की औरत,  जैसे नवदुर्गा का अवतार  हर दिन हर बार

ये भी शब्द ही हैं...

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शब्द जो एहसास कराते हैं... किसी के होने का, किसी के दुलारने का, खयाल रखना, पहुंच कर मैसेज कर देना, ठीक हो...? खाना खाया क्या..? सो रहे हो...? घर पहुंच गए...?  दवा ले ली क्या...? और फिर ये भी बात नहीं कर पाएंगे... फिर अभी व्यस्त हूं... बाद में बात करते हैं...  ये भी शब्द ही हैं... तुम मेरा घर हो..  मैं हूं ना...  से लेकर  मैं घर पर हूं बाद में बात करते हैं तक ... सब कुछ शब्दों में ही तय होता है...! किसी का आना, अपना सा बन जाना, दूर रह कर भी घर सा हो जाना ओर फिर दूर ही हो जाना सब शब्दों की जादुई नगरी में  बनना बिगड़ना कई खेलो की तरह जिंदगी इन्हीं शब्दों में करवटें बदलती है हैं मगर ये सब मात्र शब्द ही...!!!

अब कैसे

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अरे खुद से लगाती हो नेलपॉलिश उसने कहा था  मैं लगा देता... अरे खुद से पार करती हो सड़क तुम्हे तो हाथ पकड़ के चलने का मन ही नहीं करता  हां भाई सेल्फ सफीशिएंट लड़की हो... फिर पता ही नहीं चला  कब साथ साथ चलने की आदत सी लग गई  मगर हर चीज का एक अंत होना है अब तुम कहते हो खुद से भी कुछ कर लिया करो  मैं सोचती हूं अब कैसे ... न तो रस्ते पहचान आ रहे न कदम पड़ रहे सीधे  अब तुम कहते हो खुद से सबकुछ कर लूं मगर कैसे  अब तो आदत सी लग गई  तुम्हारी आँखों से दुनिया देखने की  तुम्हारे हाथ थाम चलने की अब कहां से ढूंढू एक नई मंजिल कहा ढूंढू फिर से अपने ही कदमों को आगे बढ़ने की ख्वाहिशों को... हाँ , ख्वाहिशें अब भी हैं आगे बढ़ने की... मगर कैसे ...???

हर्ज़ क्या है

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मुलाकातों का सिलसिला जारी रहना चाहिए आखिर हर्ज ही क्या है...? जानते हैं हम दोनों के बीच  खेत नदी ओर पहाड़ सब के सब थमे से हैं  इस पार की उलझने उस पार के सपनों को रौंदती सीं  काँटे बस कांटे ही कांटे... इतने कि जख्मी हो जाएं  इश्क की तरफ ताकते हुए हमारे बेचैन मन इतने कांटे कि हिम्मते फिर से जीने की  सिसक कर वही कोने में दम तोड़ दें फिर भी मुलाकातों का सिलसिला जारी रहना चाहिए आखिर हर्ज़ ही क्या है...  फ़र्क़ पड़ना  बहुत जरूरी है  कि तमाम वादे करते वक्त  हम बख़ूबी जानते हैं इनका पूरा होना असंभव सा है सपनों की फेहरिस्त बनाते हम ओर तुम बेचारगी पे हंस पड़ते हैं खुद ब खुद सब बेतुका है... जानते हो तुम  फिर भी पूछते हो उस चुनरी का रंग कैसा होगा जो खेतों में पसर कर नदी के उस पार मैदानों तक फैल सी जाएगी सपनों की चांदनी दूर दूर तक  हमारे हौंसलों के सफेद पंखों पर सवार हो उड़ान भरती है ओर इसलिए थके थके से कदम धीरे धीरे बढ़ते हैं फिर से  क्योंकि कही न कही हम सब यही चाहते हैं  मुलाकातों का सिलसिला जारी रहना चाहिए आखिर हर्ज ही क्या है....

पुनर्मृत्यु

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कोशिशें तुम्हारे गायबाने में हर चीज फिर से करने की वो जज़्बात ओ बातें ओर हरकतें वो शरारत री लिव करना किसी ओर की बातों में  पुनर्जन्म नहीं...  पुनर्मृत्यु जैसा है... फिर भी देखो हिम्मतें मेरी आज फिर से जीते हैं आज फिर से मरते हैं...

तुम सिर्फ एक प्रोप

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जिंदगी की बिसातें बैठी हुई हैं शतरंज की तरह मैं तुम वह ओर वे सारे लोग सिर्फ एक प्रोप....! मेरी कहानियों में तुम कहीं नहीं जो अब अंदर जो ज्वार उमड़ता है हर चीज हर बात ओर हर इंसान के साथ तुलनात्मक अध्ययन का  उसमें तुम सिर्फ एक पैमाना बन कर फ्लैशबैक में गुजर जाते हो...  हां कहानियां वही हैं, सड़क।पर चलते हुए  साथ भागमभाग की, दोसे के अंदर के आलू गायब  होने की  ओर नारियल पानी पीते वक्त स्ट्रॉ फेंकने की मगर तुम अब सिर्फ एक प्रोप बन जाते हो... हल्की हल्की बूंदों में मिट्टी की सोंधी महक चीखती है  उस ओर खींचती है खिड़कियों के  भूले बिसरे पर्दे में वो तमाम झलकियां मगर कहीं भी तुम नहीं सिर्फ तुम्हारा नाम एक प्रोप....

नींद भी ओर चैन भी

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इश्क़ में नींद उड़ जाती है ओर चैन भी ये बहुत के मुंह से सुना था। पता नहीं ये वाला इश्क़ कौन सा होता है मुझे तो इतनी नींद आती है कि शायद इश्क़ का स्कोप ही नहीं बचता। बहुत दिन पहले किसी ने मुझे भस्मासुर कहा सिर्फ इसलिए कि मैं 8 बजे शाम में ही सो गई थी। अब कैसे बताएं कि हम बिहार के जिस गांव से हैं वहां तो 8 बजे रात हो चुकी होती थी। लोग खाना खा कर चूल्हे की आग भी बुझा चुके होते थे।  हालांकि हमारे गांव में 4 बजे सुबह सुबह इतनी चहल पहल हो जाती है जितनी दिल्ली में 11 बजे तक भी न होती।  वहाँ तो पौ फटते ही किसान अपने खेतों की ओर बढ़ जाते ओर घर की औरतें राख से चूल्हा लीप कर कम काज की शुरुआत कर चुकी होती। गाय बैल को सानी पानी  देना, स्कूली बच्चों के लिए नाश्ता ओर टिफिन पैक करना सब इसी वक़्त होता ओर साढ़े छह बजे तो हम लोग स्कूल भागते होते थे। देश के पूर्वी हिस्से में सब कुछ जल्दी जल्दी होता है सुबह भी ओर शाम भी । तब कहा पता था 4 बजे सुबह उतने की आदत दिल्ली में इतनी बोरिंग लगने लगेगी।  अब तो सुबह 2 घंटे का समय इतना ज्यादा फ्री लगने लगता है। कभी उठ कर किचन में जाती हूं तो ल...