ब्लॉग या व लॉग
बहुत दिनों के बाद जब वापस कलम उठाई तो लगा जैसे बीच में एक सदी गुजर गई है। एक्चुअली शुरुआत ही गलत हो गई मैने कलम नहीं उठाई। मैने कंप्यूटर ऑन किया ओर स्क्रीन पर कीबोर्ड के सहारे लिखना शुरू किया । अब कलम नहीं थम्ब है अंगूठा जिससे आप लिखते होते हैं अपने फोन पर। कंप्यूटर या लैपटॉप तक भी जाने की जहमत कौन करे। सच पूछो तो मेरी गर्दन के दर्द का सारा झमेला इन अंगूठा के बीच दबे उस मोबाइल का किया धरा है। लेकिन सुबह के पांच बजे उठकर टेबल चेयर पर बैठ जाऊं ओर लैपटॉप निकाल कर लिखने लागू क्या मै इतनी कर्तव्यपरायण जागरूक इंसान हो सकती हूं ? हाहाहाहा ऐसा होता तो वो जो एम ए पत्रकारिता का कोर्स मैने 2007 में डिप्लोमा करने के बाद सोचा था वो अब तक पूरा हो जाता। हर बार एम ए का फॉर्म भर कर, फीस भर कर बड़े उत्साह के साथ शुरू तो जरूर करती हूं मगर फिर में बीच में कुछ ऐसा लगता है कि जिंदगी की बागडोर हाथ से फिसलती नजर आने लगती है। वैसे बात लिखने की हो।रही थी । मै सवेरे सवेरे इतनी।सेल्फ क्रिटिसिजम का शिकार नहीं होना चाहती। छुट्टी का दिन है, प्रोंतो ऐप से सफाई कार्यक्रम का निपटारा तय हो चुका ओर यस मै...