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उसी के नाम से अब भी

फिर वही मोड़ आ के मिलता है वो जहाँ सिर्फ दूरियों को रहना था।  ना खैरियत पूछी न हाले दिल अपना कहा  ना जाने क्यों फिर बेमुरव्वत ही मिलना था।  उसी के नाम से अब भी निकलते हैं आँसू  कि जिसके नाम से मुहब्बत का हर ख़्वाब ढलना था।  फ़ितरत उनकी बेरुखी की हमारी आरजुओ पर भारी हैं हमेशा हमही से मुखातिब हो उन्हें हमे ही रुस्वा करना था। 

जब तुम नहीं होते हो

 काली काली परछाइयों के बीच  मई बिलकुल अकेली हो जाती हूँ  भय के भयानक पंजे मुझे दबोचने लगते हैं  सच और झूठ का फरेब आग उगलता है  इन सबके बीच डरती कांपती मैं  ......सब कुछ एक दुह्स्वप्न की तरह.  तुम......,  तुम कहाँ होते हो प्रिय  तुम्हारी याद एक सिहरन बनकर उभरती है  और तुम्हारा न होना...विषदंश !!! मेरे अकेलेपन में हर तीस कि वजह तुम होते हो  क्युकि तुम वहां नहीं होते हो ! दीवार पर फैलते बिगड़ते पंजे  यादो की सिहरन और वो भयानक आग  मुझे दबोचने लगते हैं कि अचानक खुल जाती है आँखे टूट जाता है कुछ देर के लिए ही सही  तुम्हारे पास होकर भी तुम्हे खो देने का भय  पलट कर देखती हू तुम्हे छूकर  हर त्रास को झूठ समझ कर फिर सो जाने की कोशिश करते हुए 

बस चलते जाना है

 बहुत मुश्किल है खुद से प्यार करना  जब दिल यूँ बेखुदी में डूबा हो  अश्कों से पूछती हूँ ख़ुशी कि महफ़िल कहाँ है  मै उस कश्ती का नाखुदा हूँ  जिसका कोई साहिल नहीं  उम्र बस इक प्यास है लाख पीने से नहीं बुझती  कदमो को बस चलते जाना है  चाहे कोई मंजिल नहीं यूँ ही पूछ लेती हूँ हर मुसाफिर से  जरा सा साथ चल लें  अब  कोई हमसफ़र गाफिल नहीं  

कारवां

 ये सच है कि मैं वो कारवां बन गई हूँ  जिसका कोई मुकाम नहीं  पर हर एक दास्ताँ कई जिंदगियों का जीना है  बस अफ़सोस हर पन्ने को पलटते हुए  मेरी दास्ताँ में हमदम तुम्हारा कहीं नाम नहीं  अपने अश्क, हसरते और हकीकत भी  मैंने जी ली तुम्हारे वास्ते  और तुम्हारा ये कहना  कि इन सब बातों का कोई अंजाम नहीं ......

पॉपकॉर्न

कुछ अनकहे शब्द परिभाषित करते हैं अब हमारे बीच पसरे मौन वो जो बिना बोले समझ लेने वाला वाकया था न उसे हम उधर ही छोड़ आए हैं मंडी हाउस की उस चाय की दुकान पर  तुम्हारे सारे द्वंद के धुएं के साथ साथ  रिक्त जगह में भर लो जितने भी पन्ने भरने हैं श्री राम थियेटर के जीवंत नाटकों में पॉपकॉर्न और फ्रेंच फ्राई की जरूरत नहीं होती 

मिटते हुए शब्द

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उच्छवास

उदासी तुम्हारे न होने की रोज रोज खुद को याद दिलाती है  हमे किसी के लिए नहीं जागना अब देर रात तक वो देख सुबह होने को आती है कुछ थमा सा है फिर भी द्वंद बन कर  दिल और दिमाग दोनों जाना नही चाहते  अब और कहीं चल बस कर  धुंध से उभरते हो कैनवास और किताब की पंक्तियों में सांस से निकलते हो एक उच्छवास बन कर

दृष्यांतर

तुम्हे प्यार करके देखा था... तुम्हे अपनी दुनिया बना के भी देखा  तुमसे अपनी हसरतें जोड़ कर देखा और  तुम्हारे सपनो को खुद भी जी के देखा तुमको पास आते देखा था तुमको दिल पर कब्जा जमाते देखा था तुम्हारे छलावे को भी देखा था  और तुम्हे दूर जाते भी देखा था इश्क़ है आम भूख की तरह ही भूख  भी तभी तक लगती है  जबतक खाना मिलने की उम्मीद रहती है  एक हद तक भूखा रहने के बाद इंसान  सिर्फ जीता है, खाना नही ढूंढता एक हद तक प्यार करता है  और फिर प्यार की शिद्दत नही रहती  छीजते हुए उस इंद्रधनुष को अब देख रही हूं दिल से मिटते हुए वे सवाल अब देख रही हूं तुम वहीं हो हम भी वहीं  बस खुद को खुद में सिमटते  अब देख रही हूं।

वजह तुम हो

हर रोज की तरह खुद से किए गए वादे तोड़ते हैं की तुम्हे कभी याद नहीं करेंगे हर साल एक रेजोल्यूशन बनाते हैं कि तुम्हे कभी उतनी जगह नहीं देंगे की तुम आंसुओं का समंदर बहा सको हर रोज उम्मीद करते हैं तुम्हारे नाम के साथ  कोई टीस न महसूस हो  हर रोज भूल जाते हैं अपनी बेकार कोशिशें इन तमाम बातों में अफसोस है अभी तक तुम ही नजर आते हो हां हर बात की वजह तब भी तुम थे और अब भी...

मुझे नहीं आता

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सरकारी आंकड़े और कोविड

इस भीड़ की मौत से कोई मुद्दा नहीं बनेगा अगले इलेक्शन में हम तुम और तमाम कॉविड ग्रस्त लोग सिर्फ आंकड़े हैं कभी राज्य छुपाएगा कभी देश  कभी विश्व स्वास्थ्य संगठन को गरियायेंगे जोर जोर से  और तमाम देशवासी उनकी देशभक्ति से प्रफुल्लित होंगे सब आंकड़े हैं गायब कर दिए जाएंगे हमारी उम्मीदें हमारे सपने ऑफिस, बाजार, सड़के और उन पर चलते लोग स्कूल, कॉलेज और बेरोजगार होते शिक्षक गठरी बने रोड पर कुदाल, छेनी और हथौड़े लिए मजदूर बिना सवारी के घंटी टन टनाता रिक्शा सब आंकड़े हैं, गायब कर दिए जाएंगे  गुम सुम घर में ठूंसे सहमे से बच्चे उनकी दबी हुई हंसी व्हाट्स एप और रोबोलॉक्स के बीच धंसती चली जायेगी।  खेल के मैदान खाली हैं वहां कोई बाजार लग सकता है क्या खेती में किसानों को।दिलचस्पी नहीं है वे सरकार के खिलाफ मोर्चाबंदी में लगे हैं खेतों में कोई नया कारखाना लगेगा क्या बाकी तो आंकड़े हैं गायब कर दिए जाएंगे हिसाब है.. वो किसान और खेत, स्कूल और बच्चे और हमारी तुम्हारी खुली आंखों की मौत भी सब आंकड़े हैं।

फर्क

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कीमत

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मुक्ति

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कोविड

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वापसी

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आजमाईश

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जगह

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बाज़ी

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नाम

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ज़िक्र वफ़ा, बेवफ़ा, बेदर्द और दर्द की दवा.... सब एक ही नाम से क्यूं शुरू होता है..