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Showing posts with the label दिल की बात

दिल दिमाग़ और दर्द

दिल चाहता है गाना तो सुना ही होगा आपने? खासकर जब आप अपने प्रोफाइल पर 80s and 90s किड लिखते हैं और सोचते हैं सामने वाला इस बात से आपको खास तवज्जो देगा। प्रोफाइल से मतलब मेरा सोशल मीडिया से है क्योंकि आजकल लोग इंप्रेशन जमाने के लिए न तो शोले के वीरू की तरह पानी की टंकी पर चढ़ के चिल्लाते हैं और न इश्क में मर मिटने की तमन्ना लिए अनारकली की तरह दीवार में चिनने जाते हैं। सोशल मीडिया तो क्रांति ले आई इस इंप्रेशन वाले मामले में। इतना आसान है __ दो चार फोटोशॉप किए हुए फोटो लगा दो, अच्छी अच्छी बातें लिख दो, और नही आता तो किसी अच्छे लेखक या शायर की दो चार पंक्तियां उधार में डाल दो। बस हो गई एक नंबर की प्रोफाइल तैयार। उधार भी क्यों भाई साहब कहिए कि हमने ही लिखी है। सामने वाला या वाली भी लाइब्रेरी में बैठ कर बाल तो सफेद कर नहीं रहे की उन्हें पता भी हो कि जो अल्फाज पढ़ कर वो फिदा हुए जा रहे वो शेक्सपियर और रूमी के डायलॉग हैं। और पता भी चल जाए तो आप ये कह सकते हैं हमारा टेस्ट बहुत अच्छा है। इसको बोलते हैं हर्रे लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा हो जाए !     लेकिन इस हर्रे और फिटकरी के चक्कर ...

दही जमा ही रहेगा

कुछ दिन पहले हमने मुंह में दही जमने की बात क्या की लगता है सारा सिस्टम ही जम गया। सरकार है की जमी हुई है। सुशासन चल रहा और हर तरफ राम राज्य है। अगर आपकी बुद्धि खुली हुई है तो सबकुछ सही चल रहा, जमे हुए दही की तरह। क्योंकि दही का जम जाना ही सही होता है ये तो आप जानते हैं। कमाल का उदाहरण है। लोकतंत्र के सफल और असफल होने की सारी परिभाषा ही बदल जायेगी। और इस नई परिभाषा के आविष्कार के बाद मुझे लगता है मुझे भी अब राजनीति में कूद जाना चाहिए। पर प्रोब्लम सिर्फ उन लोगो की है जो गोदी मीडिया नही देखते। उनको रवीश कुमार की बातें अच्छी लगती हैं और वो इस घोर सतयुग में भी बुराइयां खोजते हैं। आप किसी एक पार्टी के प्रवक्ता की बात पर किसी देश का बॉयकॉट कैसे कर सकते हैं। लगता है अरब देशों को सोने की चिड़िया की कद्र नहीं। हमारे पास क्या नही है। अगर वो हमारा बहिष्कार करेंगे तो उनका घाटा है। बाकी हमको तो इस देश में कुछ होता गलत लगता ही नहीं। जो हो रहा वो इंटरनल है भाई सब। आंतरिक नीति, समझे कि नहीं। हम कश्मीर को लद्दाख बनाए या पाओभाजी में आइसक्रीम मिलाएं आपको क्या? देश विदेश में हमारी जय जय हो रही। यूक्रेन और...

दही जो लगा है छूटता नहीं

🥛 ये एक ग्लास दही है और दही के लिए कुछ बड़े अच्छे विचार दिमाग में आ रहे। कभी पढ़ा था दही जो लगा है वो कहीं छूटता नही। मतलब एक बार जो जुड़ गया वो भूलता नहीं। किसी पुराने परिचित से मुलाकात हुई और बरबस ही याद आ गया। बाकी ग्लास तो हमने इमोजी से लिया है और होने के लिए ये दूध भी हो सकता है। पर आजकल सबकुछ मानने पर है। मानो तो देव नही तो पत्थर। अब हम तो पत्थर ही मानते हैं और पत्थर से बहुतों का भला हो सकता है। पहले जमाने में लोग कुटाई पिसाई कर लेते थे, आजकल दंगा फैलाने में काम आता है।  दंगा फैलाने से याद आया कल बेटी को कोई गृहकार्य मिला था स्कूल में उसको होमवर्क बोलते हैं। पर हम अगर गृहकार्य न कहें तो आप कहेंगे हम हिंदी भूल गए, और अगर होमवर्क न कहे तो पल्ले नहीं पड़ेगा कई लोगों के। तो उस गृहकार्य में कुछ ऐसे शब्द थे जो सही नही लगे मसलन हिंदू, मुसलमान, पत्थर और लाठियां, छोटे बच्चे मिलकर एक नाटक कर रहे और उसकी विषय वस्तु में शब्द बहुत डरवाने लग रहे। खासकर इस माहौल में जब किसी को फोन करके ईद मुबारक कहने से भी डर लग रहा। हमने तो अपने दोस्तो को उलाहना भी नही दिया की सेवई नही खिलाई।  खैर म...

' ट ' वर्गीय ण वाली जिंदगी

घर में किसी को बहुत हैरानी नहीं होती जब हम कोई ऐसा शब्द प्रयोग करते हैं जो है ही नहीं। पर हां हंसते बहुत है। बल्कि हमारा दावा है कि वर्तमान हिंदी में ज्यादातर क्रांतिकारी शब्द मैने और मेरे आसपास के स्वनाम धन्य बिहारी भाई बहनों ने ही बनाए हैं। अब आप ' मुन्नी बदनाम हुई, मैं झंडू बाम हुई' गाने को ही लीजिए । मैने झंडू बाम इसलिए बोला अपनी जिंदगी को क्युकी मुझे पसंद नही था कि मेरी लाइफ मेरे कॉलेज के रिजल्ट से परिभाषित हो। इससे भी ज्यादा मुझे इस बात से रंजिश थी कि जिंदगी झंड है बोलने में भाषा थोड़ी पुरुषोचित लग रही थी। अब इसको संयोग कहे कि साजिश तीन साल के अंदर मेरा कॉपी राइट लेने लायक शब्द आविष्कार देश की हर गली के जुबान पर! अब दोस्त लोग बोलते हैं हम फालतू में फुटेज ले रहे। लेकिन हम कह रहे आपको एक बिहारी सौ पर भारी! आप देख लीजिएगा थोड़े दिन बाद लोग मेरे मुंह से निकला ये ट वर्गीय ण वाला एक्सप्रेशन भी चुरा लेंगे और तब कहेंगे ई त पहले से था हो।  तो इसलिए पहले ही अपनी चेतना को जागृत करते हुए हम आज लिख रहे की मेरी जिंदगी ट वर्गीय ण बन गई है - मतलब मुश्किल और एकदम बेकार फिर भी एकदम झक्कास...

स्त्री बनना पड़ता है

जिंदगी में बहुत सारी चीजें पहले से पैर नहीं होते। समाज में स्त्री की एक परिभाषा तय कर दी गई है। जब भी स्त्री उस चौखट से निकलना चाहती है वह हाशिए पर खड़ी होती है। सवाल यह नहीं है कि वह उस परिभाषा से निकलना चाहती हैं बल्कि सवाल यह है स्त्रियों के लिए यह मापदंड किसने और कब बनाए।  अगर शुरू से शुरू करें तो समाज में हर चीज पुरुष प्रधान रही है। चाहे वह शारीरिक दुर्बलता हो, चाहे संपत्ति पर अधिकार की बात या समाज में अपने स्थान को कायम रखने की बात, स्त्री अपने जीवन की परिभाषा ओं के लिए पुरुष पर निर्भर है और यह निर्भरता पुरुषों ने ही तय किया है। आज की स्त्री की स्थिति कई बातों से मिलकर तय हुई है: 1 समाज की ऐतिहासिक संरचना 2 शारीरिक दुर्बलता 3 स्त्री और सामाजिक जिम्मेदारियां 4 परिवार और स्त्री 5 वैवाहिक संरचना और स्त्री 6 बदलते परिवेश में बढ़ते हुए दोहरे दायित्व 7 बदलती पृष्ठभूमि में स्त्री

एक अलसाई दोपहर- इंडिया गेट पर

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बहुत दिनों के बाद आज अकेली पहुच गयी इंडिया गेट के पास. शायद गलती से-सही जगह..और गुनगुनाती धुप में हरी घास पर अकेले चलते हुए एहसास हुआ -- न जाने कितनी चीजों के अपने साथ होने का..सामने वो इमारते जो जाने कितने वर्षों से इस देश के अस्तित्वा का प्रतीक बनी हुई कड़ी हैं..स्वतंत्र, स्वाधीन गणतंत्र.. ..और झलकती हैं गणतंत्र दिवस के परेड की झांकियां..जिसे देखने न जाने कितनी बार हम सवेरे सवेरे कॉलेज हॉस्टल से इंडिया गेट की तरफ निकल पड़ते थे.. मेट्रो स्टेशन से निकलती हूँ....मेट्रो..का होना भी कितना सुखद है. जब कॉलेज के आखिरी दिन थे..२००४ में मेट्रो आ चुकी थी पर सिर्फ रेड लाइन चली थी वो भी तिस हजारी से शाहदरा तक...एक बार टिकट लिया हमने भी ..जॉय राइड --आनंद यात्रा का... तब दिल्ली में लोग खासकर बाहर से आये पर्यटक, लाखों की तादाद में रोज पहुँचते थे मेट्रो की सवारी करने..मानों मेट्रो पर्व मना रहे हों. टोकन लेने की लाइन इतनी बड़ी थी कि प्लेटफार्म पर शायद ही अंटे..बस एक हसरत लिए सब..ऐ सी वाली फर्राटेदार मेट्रो रेल की सवारी करनी है... धीरे-धीरे  दिल्ली की रोजमर्रा की कशमकश का अनिवार्य हिस्सा बन गयी...

आखिरी खुदा

दिन बीतते जाते हैं..उम्र की कई दह्लीजे खिसकती जाती हैं..हमारे दायरे सिकुड़ते और बढ़ते रहते हैं...उन दायरों में शायद अभी भी वो खालीपन बाकी है..कुछ और ..कुछ और और शायद कुछ और की तलाश... शब्दों से प्यार करना भी एक खता है..कुछ शब्द आपके लिए सपने ले आते हैं, कुछ सच के जलते शोले..कुछ नमकीन पानी बन आँखों से बह जाते है..कुछ पुकार बन हवा में तैर जाते है...मुझे अभी भी कुछ और शब्दों की तलाश है... लगता है वक़्त के साथ चलने की दुनिया कि दौड़ में हम ज़रा पीछे रह गए..सब कुछ थमा थमा सा लगता है..सारे स्वप्न, कल्पनाएँ, यहाँ तक कि दिन और रात भी...पर सिर्फ मेरे लिए..बाकि दुनिया जैसे सरपट दौड़ रही है.. अकेलापन वह भी भीड़ में होते हुए..चाहे वो हँसता-खेलता बचपन हो या नवोदय विद्यालय के दिन, मिरांडा हाउस के कॉरिडोर से गुजरते हुए या दिल्ली विश्वविद्यालय कैंपस में घुमते वक्त, मैंने हमेशा अपने आप को अकेले कोनों में सिमटते पाया..नहीं घुल मिल पाती सबके साथ ...कभी दोस्तों के ग्रुप्स में मैं शामिल नहीं थी..बल्कि कई तो क्लास के ग्रुप में भी मुझे पाकर असहज हो जाते थे..वज़ह मैं जान नहीं पायी.. आज...
उस आखिरी वक़्त मौत मुझे बख्शेगी नहीं ... मैंने तमाम उम्र जिन्दगी से बेवफाई जो की है ..

Why this Kolaveri Kolaveri kolaveri....

The song "why this Kolaveri di, became a phenomenal song, due to its simple lyrics and amazing tune.....One of my friend asked me to reconsider my liking for Kolaveri Di as it uses some outrageous words against girls..like white skin, black heart and killer rage [meaning of kolaveri].... I guess people who like this song with true understanding of these words can better answer why they liked it so much. Most of the north Indians or people abroad who were not familiar with the original lyrics have perhaps did not bother about the literal meaning rather its ease to muse people with simplicity and melody.. Seeking happiness in love is more painful than this Kolaveri I guess..When you are in love, everything seems pink; every idea seems great and every dream is under the quote "possible"..You want to sleep, eat, think, drink and sing with the tunes your lover want you to...Even if you don't like it.. But like everything ephemeral in this world..this magic too breaks...

My student

The story I am telling is about an eight year old Sikh boy. His name was Noor . He was tall and thin, his rosy face had a glaze, over shining the sun rays and his golden eyes penetrated deep to the bottom of heart of anybody when he raised his face. The mount of hair over his head was daily tied by his mother with a black apron which he called his ‘Juri’ . I was appointed as a tutor for this rosy boy with golden eyes. I was myself a sixteen year old girl but pretended to look much older in order to convince Noor’s mother about my experience in teaching . For this I used to wear Churidar and Kameez with loose-fitting and lied to her that I was already an M.Sc. Mathematics, whereas in reality was a first year student in my college. The tuition bureau through which I had got this tuition had given me all the instructions I followed to impress the child’s mother. When I entered their house for the first time, I was stopped by to big dogs, barking terribly and almost ready to kil...

Winning your love back

It's love that makes a life full of colours. It is love that makes your life fulfilled, and it is love which gives you aim to achieve happiness. But, what when you lose your love? Suddenly your life seems hazy, full of darkness and you lose all your hopes and emotion. It is therefore as challenging to win your love back as to get it for then first time. You need to find out first what were the reasons due to which you had failed in love. Knowing this is not so easy as it is difficult for anybody to accept his or her own follies. But once you realize, you would take no time to over come them. Note all your virtues what your lover liked in you. Do not think of what you boasted about, just think of the real you and the positives aspects of your personality, which attracted your lover.

She is shifting abroad due to problems in car parking?????

The title sounds quite strange. One of my friend is shifting abroad because she has problem in car parking in Delhi.. Well, this has not been said jokingly. My friend, who is married with a guy settled in London recently was reluctant to go seeing little scope for herself there. As a working women with high self esteem, she preferred living independently instead of settling down just a housewife. However, her neighbors did not let her rest for a single minute. The car parking place provided by her landlord was denied to her by nasty neighbors and she faced problems in leaving her car far from her residence and come alone in the night. This is a common story for young women in Delhi, who claim to be self-dependent or at least try to live alone.Despite boasting of a cosmopolitan global city, Delhi is ruthless toward women. Be it a traffic signal, or a park, car parking or a less crowded road; hypocrite men do not leave a single chance of harassing women. If you are young and confident...

चाहे ठोकर मिले या मंजिल..

कुछ लोग बड़े आराम से चुन लेते है कि क्या बताना है, क्या छुपाना है, पर शायद ये विद्या मैंने सीखी नहीं, या सीखना आया नहीं..गुरु जी ने कहा जिन्दगी खुली किताब की तरह जियो, पर शायद ये बताना भूल गए की किताब के उन पन्नो को उन लोगो के सामने बंद कर दो, जो पढने की बजाय, शब्दों में आंसू ढूंढने लगे ओउर पन्नो की खूबसूरती से खेलने लगे... कदमो की आहटे कहती हैं, ये मेरे खुद के हैं, मेरे लिए कोई रास्ता पहले से नहीं बना न कोई मंजिल है तयशुदा...खुद ढूँढना होगा मुखं अपना, खुद बनाना पड़ेगा मुकद्दर भी.. शायद ये भी उतना मुश्किल नहीं होता अगर मैं नियति को बिलकुल अस्वीकार कर देती, पर कही न कही, मैं जाग उठी फिर...अन्दर का उबाल, रक्त में जमे स्वाभिमानी संस्कार विद्रोह कर बैठे..नहीं मैं लकीर की फ़कीर नहीं रह सकती... सवाल ये नहीं की रास्ता कौन सा है..सवाल ये है, रास्ता चुनने का अधिकार आपके पास है या नहीं... बहुत अफ़सोस की ये रास्ता मैंने खुद नहीं चुना था...हाँ अंतिम वक़्त पर कदम उठाते वक़्त सिर्फ इतना सोच पाई की मेरे लिए रास्ते चुनने का हक दुबारा किसी ओउर के हाथ में नहीं दूंगी....चाहे ठोकर मिले या मंजिल...

क्या आप खुश हैं?

ये सवाल मुझे पिछले २० सालो से कोंचता रहता है.. नहीं जानती वाकई में ख़ुशी  है क्या... अगर आपको पता हो तो जरुर बताइयेगा... मै कोई फिलोसोफी सुनने के मूड में नहीं, न आध्यात्मिक  हो गयी हु अचानक से.  पहले मुझे लगता था आपनी शर्तो पे अपनी जिदगी जी लेने में ख़ुशी होगी, बुत उसके लिए कभी कोशिश नहीं की...पढाई, परिवार, घर, और घर के लोग ये ज्यादा महत्वपूर्ण थे बनिस्पत की ख़ुशी की उस परिभाषा को जानने की जो मेरे लिए सही पैमाना बनती... हम वो हर कोशिश करते है, जिससे अपनों को ख़ुशी मिले और शायद उसी में खुद को खुश करने का बहाना ढूढ़ते फिरते है... पर शायद ये भी ख़ुशी का सही पैमाना नहीं..सबको खुश रखने की फिराक में हम खुद को भूल बैठते है, और अचानक फिर वही खालीपन काटने दोरता है, जिसे भागने के लिए हम रिश्तो का तानाबाना बनाते रहते है... फिर ख़ुशी को पाने की जिद भी उस बच्चे की जिद की तरह हो जाती है, जो मेले में एक खिलौने को लेने की जिद में माँ से बिछुड़  जाये..हम ख़ुशी धुन्धने की तलाश में आगे बढ़ते जाते है...एक रास्ते  से दुसरे रास्ते..इस मुकाम से उस मुकाम पर और फिर  अच...

Get married and settle down

Recently went through a Hindi blog--http://shaadikarwao.blogspot.com/ Though the blogger intends to put it with a touch of fun and sarcasm about the Indian society and marriage norms,and he does it beautifully, my thoughts led to some different aspects of it. Can Indian society think beyond marriages. Even in 21'st century, our main motto of life remains narrowed down in few things--- get educated, get a job and then settle down. There is a lot of change in the thinking toward career and way of living, but it is not so as far as the perception toward life is concerned. So it does not matter yet if you are well qualified here and got your salary in lacs per month. Your father and mother, brothers and sisters and uncles and aunts [fortunately we have plenty of them in India] will always be concerned about your marriage and getting you settle down. So guys before they ask you about your intentions behind staying single or doubt if the boy is going badly westernized [the way they q...

my horoscope

Everyday I check my horoscope just curiously what the stars say about my day and life. today it says: "You are ready to jump into an activity that takes your mind off more serious concerns now. Luckily, you could have a really fun time playing with a friend, but the actual event may not live up to your expectations. However, a little escape will do you a world of good as long as you are willing to come back and deal with the tougher issues that you left behind." Now I wonder what it actually talks about. i have found on many lazy days, when I was enjoying sleeping whole day in my bed and doing nothing, my hosroscope had put many 'tough' issues to be dealt with. I guess they were talking about the toughness of my quilt [LOL]!!