Posts

Showing posts from July, 2026

मन नहीं भरता

Image
जिंदगी एक प्यास बन कर रह गई... बचपन में जब ये गाना सुनती थी समझ नहीं आता था! क्यों प्यास बन कर रह गई भाई इतना पानी है हर जगह जहाँ जाके पीना हो पी लो! एक ग्लास से मन नहीं भरे तो चार ग्लास पी लो! ओर घर में दूध दही भी तब खूब हुआ करता था । पानी से मन नहीं भर रहा तो दो चार ग्लास दूध ही पी लेते थे। अब ऐसा क्या मन कि इतने के बाद भी न भरे? मन ही है कोई बैल का पेट थोड़े है ! ओर इंसान का पेट तो दो चार रोटी खा के भी भर जाता है।    इंसान के पेट से एक बात याद आ गई। गाँव में मजदूर जब भी हमारे घर काम करने आते थे तो माँ चूल्हा जलाती थी। बात उतनी पुरानी नहीं है कि रसोई में चूल्हा ही जले। मगर गेस चूल्हा घर के खाने के लिए, दो चार लोगों के लिए बनाने के लिए काफी माना जाता था या गेस्ट आये तो उनके लिए चाय बनाने के लिए। शुरू शुरू में सब ऐसा ही करते थे। जिस दिन ज्यादा मेहमान आ गए तो बस मिट्टी वाला चूल्हा ही जोड़ते थे । तो मजदूर जब भी आयें उनके लिए रोटियों का महल बनता था । महल इसलिए कि वो एक साथ 20-25 रोटी तो खा ही लेते थे। तो माँ उनके लिए मोटी  मोटी रोटियां बनाती थी वो भी हाथ से। चाहे क...