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यहां पर बस शान्ति शांति है

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मार धाड़, ट्रैफिक हड़ताल, भीड़, चोर, पुलिस ओर कुछ बवाल भी टीवी, रेडियो चीख चीख पूछ रहे सवाल भी  हम मगर ऑफिस जाएंगे  यहां पर बस शान्ति शांति है...  शेयर गिरा, सोना उछला, चांदी गई तरी पार सब्जी दूध गायब गायब हो गए बंद है बाजार  छोड़ दो स्कूल अब बोर्ड ओर इम्तिहाँ  हम मगर ऑफिस जाएंगे  यहां पर बस शान्ति शांति है  बच्चे भूखे जंतर मंतर पर, नेता सारे टूर पर डंडा लेके भागी पुलिस, खूब मचा दी भगदड़ साधु संत सम्हाले कुर्सी, जनता सारी रोड पर हम मगर ऑफिस जाएंगे  चाय पियेंगे , फाइल बनाएंगे  यहां पर बस शान्ति शांति है...

मन नहीं भरता

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जिंदगी एक प्यास बन कर रह गई... बचपन में जब ये गाना सुनती थी समझ नहीं आता था! क्यों प्यास बन कर रह गई भाई इतना पानी है हर जगह जहाँ जाके पीना हो पी लो! एक ग्लास से मन नहीं भरे तो चार ग्लास पी लो! ओर घर में दूध दही भी तब खूब हुआ करता था । पानी से मन नहीं भर रहा तो दो चार ग्लास दूध ही पी लेते थे। अब ऐसा क्या मन कि इतने के बाद भी न भरे? मन ही है कोई बैल का पेट थोड़े है ! ओर इंसान का पेट तो दो चार रोटी खा के भी भर जाता है।    इंसान के पेट से एक बात याद आ गई। गाँव में मजदूर जब भी हमारे घर काम करने आते थे तो माँ चूल्हा जलाती थी। बात उतनी पुरानी नहीं है कि रसोई में चूल्हा ही जले। मगर गेस चूल्हा घर के खाने के लिए, दो चार लोगों के लिए बनाने के लिए काफी माना जाता था या गेस्ट आये तो उनके लिए चाय बनाने के लिए। शुरू शुरू में सब ऐसा ही करते थे। जिस दिन ज्यादा मेहमान आ गए तो बस मिट्टी वाला चूल्हा ही जोड़ते थे । तो मजदूर जब भी आयें उनके लिए रोटियों का महल बनता था । महल इसलिए कि वो एक साथ 20-25 रोटी तो खा ही लेते थे। तो माँ उनके लिए मोटी  मोटी रोटियां बनाती थी वो भी हाथ से। चाहे क...