मन नहीं भरता


जिंदगी एक प्यास बन कर रह गई... बचपन में जब ये गाना सुनती थी समझ नहीं आता था! क्यों प्यास बन कर रह गई भाई इतना पानी है हर जगह जहाँ जाके पीना हो पी लो! एक ग्लास से मन नहीं भरे तो चार ग्लास पी लो! ओर घर में दूध दही भी तब खूब हुआ करता था । पानी से मन नहीं भर रहा तो दो चार ग्लास दूध ही पी लेते थे। अब ऐसा क्या मन कि इतने के बाद भी न भरे? मन ही है कोई बैल का पेट थोड़े है ! ओर इंसान का पेट तो दो चार रोटी खा के भी भर जाता है।
  
इंसान के पेट से एक बात याद आ गई। गाँव में मजदूर जब भी हमारे घर काम करने आते थे तो माँ चूल्हा जलाती थी। बात उतनी पुरानी नहीं है कि रसोई में चूल्हा ही जले। मगर गेस चूल्हा घर के खाने के लिए, दो चार लोगों के लिए बनाने के लिए काफी माना जाता था या गेस्ट आये तो उनके लिए चाय बनाने के लिए। शुरू शुरू में सब ऐसा ही करते थे। जिस दिन ज्यादा मेहमान आ गए तो बस मिट्टी वाला चूल्हा ही जोड़ते थे । तो मजदूर जब भी आयें उनके लिए रोटियों का महल बनता था । महल इसलिए कि वो एक साथ 20-25 रोटी तो खा ही लेते थे। तो माँ उनके लिए मोटी  मोटी रोटियां बनाती थी वो भी हाथ से। चाहे कितनी भी सब्जी बना के दो, बुधवा आखिर में बोल ही देता था  "मलकिनी सब्जी से न होत, तनक मिर्ची नमक ओर प्याज दे दिया! "

मां हँस पड़ती थी ओर सबको फिर ढेर सारी मिर्च, नमक ओर प्याज भी परोसा जाता। हम सारे बच्चे ठिठ्ठियाते ओर कहते बुधवा का पेट रावण से भी बड़ा है, कितना भी खाए वो भूखा ही रहेगा! पर काम भी तो उसका इतना बड़ा था! कितना भी भारी बोझा हो अनाज का, मखान का या आम का सब एक बार में उठा लेता था। मजदूरी के अलावा वो रोज रिक्शा भी चलाता था। उफ्फ वो रिक्शा...! हम लोगों के लिए किसी हवाई जहाज से कम न होता था। दरभंगा बाजार जाना हो कि डॉक्टर से दिखाना हो कि लहेरियासराय से ट्रेन पकड़ने हो, ये तो तय था कि जाएंगे बुधवा के रिक्शे से ही। 

बहुत बाद में हमे पता चला कि उसके बाप दादा बंधुआ मजदूर हुआ करते थे लेकिन बाद में सरकार ने तो उनको बंधुआ मजदूरी से फ्री कर दिया फिर भी वो हमारे परिवार के विश्वस्त लोग थे ओर जब भी फसल का समय आता तो उन्हीं को बुलाया जाता दिहाड़ी पर। 

खैर बात तो मन की हो रही थी, मन की बात तो वैसे भी बेलगाम होती है तो मेरे मन की डोर भी बचपन में जा डूबी। लेकिन बुधवा के रोटी खाने ओर उसके मन भरने की एक सीमा तो तय ही थी। उसका काम था जी तोड़ मेहनत करना ओर फिर भर पेट खाना खाना। आज के समय में।अगर इतने से लोगों का काम चल जाए तो क्या ही मजा आ जाए। सब एक दूसरे से लड़ना, कम्पटीशन करना सब भूल जाएं। 

मगर बात तो मन की है ओर मन कहां भरता है कुछ भी पाकर। शहर आए तो सोचा बहुत पढ़ाई करेंगे तो मन भर जाएगा। फिर पढ़ाई करते करते लगा न पैसा भी बहुत जरूरी चीज है। अब भैया ये पैसे पे बात अटक गई। बहुत बड़े होने पर ये समझ आया कि पैसे ओर पढ़ाई का सम्बन्ध कुछ ज्यादा सटीक नहीं बैठ रहा। वरना गांव में जो कुमार दुकान वाला है उसके पास तो बहुत पैसा है वो भी पढ़ा लिखा नहीं, हमारे एक रिश्तेदार मैट्रिक फेल कहलाते थे पर वो बहुत अमीर हो गये थे। गाँव में एक ओर आदमी था उसको सब टाटा बिड़ला बोलते थे लेकिन उसका ये असली नाम नहीं था। वो बहुत अमीर हो गया था  इसलिए उसको टाटा बिड़ला बना दिया गया। अब असली में टाटा बिड़ला के खानदान को भी नहीं मालूम होगा कि दरभंगा जिले के सुदूर एक गांव में उनके नाम की खेती चल रही !

अब शहर के लोगों का मन पैसे से क्या भरेगा, एक मकान लिया तो उससे अच्छा अब दूसरा मकान चाहिए, टीवी खरीदा तो थोड़े दिन में एल ई डी टीवी आ गया, घर में लोग ज्यादा होते थे तो लोग लड़ते रहते थे, अब लोग नहीं हैं ओर हैं भी तो अपने अपने कमरे में बंद तो लोग अब सिरी ओर अलेक्सा से लड़ते हैं। मन की बात करें तो किससे करें। सब कोई इतने महान थोड़े हैं कि रेडियो ओर टीवी पर अपने दिल की बात करें।

तो असल बात ये है कि बुधवा की जिंदगी ज्यादा सही साबित हो रही आजकल अपनी लाइफ को देख कर। घर मकान गाड़ी कुछ भी ले लो, एलेक्सा, सिरी, मेटा सबसे बात कर लो, मन नहीं भरेगा! मन अभागा उसी गांव के टूटते फूटे हवेली के कोनिया घर की तरफ भागता है और बुधवा के रिक्शे के पीछे लटक लटक कर हवाई जहाज की तरह फुर्र फुर्र उड़ने के लिए बेचैन हो जाता है।

Comments

Popular posts from this blog

जब से तुम गए हो

वर्ष 2025 में नारी समानता