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दूध ओर रोटी

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दूध ओर रोटी, कुत्ता ओर मजदूर, ज्यादा फर्क कहां है इनमें!  कुत्ता ------- व्यक्ति की शान माना जाता जिसे गोद में उठाए चलते हैं लोग उसकी आंखों की चमक में  खोजते हैं अपना वैभव ओर करते हैं इसके सहारे  अपनी विलासिता का प्रदर्शन!  कुत्ता ---------- दूध का उपभोक्ता है स्तर की पहचान देता है कार में बैठा रहता है दम दबा कर.... और रोटी-------??? खुराक एक मजदूर की भूख से बिलबिलाए पिचके पेट पपोले होठों पर जीभ फेरते  गड्ढे में धंसी आंखे जिसकी चमक उठती हैं ----------- रोटी देखकर ! जिसे पाने की आशा में चल पड़ता है गिरती पड़ती बोरी को पीठ पर सम्हाले मज़दूर....! मजदूर -------- जिसके साथ बंधी होती है बच्चों की तड़प महीने भर से रोके हुए है अपने हाथों को नहीं फैलाते किसी के सामने उन्हें भूख मिटाने को निहारते हैं स्वाभिमानी बच्चे  बोझ उठाते दूर जाते हुए अपने मजदूर पिता को मांगते नहीं किसी से भीख रोटी की खोज में ! रोटी --------- स्वप्न है उनका सौंदर्य, मान ओर  चिथड़े में झलकता स्वाभिमान भी सचमुच फर्क है दूध ओर रोटी में  बहुत बहुत फर्क है....

QUESTION HOUR

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  I looked at him He looked at me And time stopped I forgot it was a time  to answer the questions asked He continued peeping in papers and documents A glance slipping through hands,  notes, pens and nail polish. A pause at neck, ears, lips and saree And time stopped I suddenly remmebered I had to look in eyes Face him direct and still  had to reply what he asked  even when it didn't matter Yes it didn't matter at all In that very moment we both knew  What mattered now  was not written, not asked  Just felt from the side of smirks  and the hidden smiles That remained there for hours, days and months

एक ओर चाय बेस्वाद थी

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इस बार  चाय बेस्वाद थी वो चाय के साथ यादों के आसंग बनाने नहीं आया था न बेगम अख्तर के गाने सुनने थे बगल ने बैठ कर  न गाड़ी सही से चलाने की नसीहत देनी थी इस बार वो उन वादों को फिर से दोहराने नहीं आया था जिनकी फेहरिस्त मैने जुबान पर रट हजारों ख्वाहिशें पाली थीं  इस बार वो बहुत चौकन्ना आया था  हालांकि अभी भी ये बात जनवरी के धुएं भरे कोहरे में छुपी सी है कि आखिर वो क्यों आया था हम दो शुतुरमुर्ग अपनी अपनी खाल में खुद को छुपाए रहे रेत में सिर घुसा कर इस बार हमारे बीच विचारों की जटिलताएं बहुत गहरी दूरियां बन गई थीं इस बार हमने साथ चाय भी नहीं पी  ओर आखिरी चाय जो उसके जाने के बाद  उस जूठी कप में मैने पी उसमें कोई स्वाद नहीं था ....