उस आखिरी वक़्त मौत मुझे बख्शेगी नहीं ... मैंने तमाम उम्र जिन्दगी से बेवफाई जो की है ..
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जब से तुम गए हो
जब से तुम गए हो .... हां मैने अब इस बात को स्वीकार कर लिया है कि दो समानांतर रेखाएं मिल नहीं सकतीं मैने मान लिया है कि कुछ रिश्तों की रिप्लेसमेंट नहीं होती और जिंदगी का आखिरी मुकाम एक अनंत तलाश नहीं हो सकती जैसा तुम मानते हो/ थे बड़े आराम से हर बार अपने बे असूल जिंदगी में जौन इलिया को दोहरा देते थे कि तुम्हारी ही तमन्ना क्यों करें हम अब तो मैने ये भी मान लिया है कि 21वीं सदी में मुकम्मल जिंदगी ओर इश्क के सपने दोनों ही सिरे से गायब हो चुके हैं अब लोग कार्प दियाम ओर क्षण में जीने का दम भरते हैं बहुत ही अभिमान के साथ ओर जाते जाते तुम ये भी अहसास करवा गए हो कि मेरी खुशफहमियों की सारी चाबियां मेरे ही पास हैं अब अपनी रफ्तार में किसी पिलियन के शरीक होने की दरकार नहीं
अब कैसे
अरे खुद से लगाती हो नेलपॉलिश उसने कहा था मैं लगा देता... अरे खुद से पार करती हो सड़क तुम्हे तो हाथ पकड़ के चलने का मन ही नहीं करता हां भाई सेल्फ सफीशिएंट लड़की हो... फिर पता ही नहीं चला कब साथ साथ चलने की आदत सी लग गई मगर हर चीज का एक अंत होना है अब तुम कहते हो खुद से भी कुछ कर लिया करो मैं सोचती हूं अब कैसे ... न तो रस्ते पहचान आ रहे न कदम पड़ रहे सीधे अब तुम कहते हो खुद से सबकुछ कर लूं मगर कैसे अब तो आदत सी लग गई तुम्हारी आँखों से दुनिया देखने की तुम्हारे हाथ थाम चलने की अब कहां से ढूंढू एक नई मंजिल कहा ढूंढू फिर से अपने ही कदमों को आगे बढ़ने की ख्वाहिशों को... हाँ , ख्वाहिशें अब भी हैं आगे बढ़ने की... मगर कैसे ...???
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