अब कैसे

अरे खुद से लगाती हो नेलपॉलिश उसने कहा था 
मैं लगा देता...
अरे खुद से पार करती हो सड़क
तुम्हे तो हाथ पकड़ के चलने का मन ही नहीं करता 
हां भाई सेल्फ सफीशिएंट लड़की हो...
फिर पता ही नहीं चला
 कब साथ साथ चलने की आदत सी लग गई 
मगर हर चीज का एक अंत होना है
अब तुम कहते हो खुद से भी कुछ कर लिया करो 
मैं सोचती हूं अब कैसे ...

न तो रस्ते पहचान आ रहे न कदम पड़ रहे सीधे 
अब तुम कहते हो खुद से सबकुछ कर लूं
मगर कैसे 
अब तो आदत सी लग गई 
तुम्हारी आँखों से दुनिया देखने की 
तुम्हारे हाथ थाम चलने की
अब कहां से ढूंढू एक नई मंजिल
कहा ढूंढू फिर से अपने ही कदमों को
आगे बढ़ने की ख्वाहिशों को...
हाँ , ख्वाहिशें अब भी हैं आगे बढ़ने की...
मगर कैसे ...???

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