Posts

अलविदा दोस्त एक नए सफ़र के लिए

Image
अलविदा कहना आसान नहीं होता क्योंकि अलविदा कहते वक़्त भी छूट जाता है बहुत कुछ जुड़ा सा अलविदा हम उन तमाम यादों को कह सकते हैं जिनके गवाह सिर्फ मैं, तुम और ये सारी कायनात है . अलविदा गंगा ढाबा के उन सस्ते पकौड़ों और चायों को भी, जिन्हें पीने के लिए तुम युही अक्सर घर से ३४ किलोमीटर दूर गुजर जाया करते थे अलविदा हर जुलूस और जलसे में मेरे जाने से पहले दी गयी तुम्हारी नसीहतों को भी जिसे हम अपने और तुम्हारे उसूलों का फर्क  बताकर नजरअंदाज कर देते हैं  आओ अलविदा कहते हैं , कॉफ़ी हाउस को, सीसीडी, बरिस्ता, और विश्वविद्यालय की नुक्कड़ वाली चाय को आओ अलविदा कहते हैं मेट्रो के उन स्टेशनों को जहा मेरी तुम्हारी गाडी जब तब साथ हो जाती है अलविदा ट्रैफिक की उन रोशनियों को भी जो हमने साथ साथ पार की हैं... अलविदा मेरे  'चिरकुट'  कहने पर तुम्हारी खीझ भरी शिकायतों को भी अलविदा तुम्हारे हर सरीके से पूछे गए सवालों पर अपनी बेफिक्री को भी तुम्हारे मी लार्ड और डिसक्लैमेर्स को भी क्युकि मेरी शिकायतों की अदालत से अब तुम बाहर हो. आओ आज अलविदा कहते हैं मिलकर .. उन तमाम बातों को...

खौफ लफ़्ज़ों से हो तो मौन रहिये

Image
खौफ लफ़्ज़ों से हो तो फिर मौन रहिये दाग दामन में हों तो मौन रहिये हमने तो नाम भी नहीं लिया आपका आपकी दाढ़ी में तिनका निकला हुज़ूर मौन रहिये जो कौम सवालों से डरती है वो खुदा के नाम हर छद्म भरती है आप तो नाखुदा के सेहन में हैं फिर भी तूफ़ान से डर  हो तो मौन रहिये अजनबी शहर के अजनबी लोग हैं मुद्दतों साथ रहते साथ जीते से अलग अलग आप तो जमाने की चाहत हैं बेचैनी अपनों की हिकारत से है तो मौन रहिये फ़िक्र नहीं कभी तो गर्क होगी दीवार फरेब की आप नकाबों में छुपे ही खूबसूरत रहें हम तो लफ्जों को जीते हैं कुछ तो कहेंगे ही खौफ लफ़्ज़ों से हो तो मौन रहिये

चुराने लगी हो तुम मेरी कविता

सुना है आजकल चुराने लगी हो तुम मेरी कविता शब्द मेरे तुम्हे इतने अपने लगने लगे हैं तुम समझ बैठी हो उन्हें अपना ही पर क्या अपनी लगेंगी शब्दों के साथ वो तमाम   चीजें भी जो उन कविताओं में हैं हंसी और आंसू , अफ़सोस रिश्तो के खोखले होने का इनकार उन समझौतावादी बातों से जो लकीरों से जकड़ती हैं इंसानियत को क्या तुम ढूंढ लोगी उन्ही शब्दों में खुद को जो शब्द मेरे जिए हुए एहसास हैं क्या महसूस लोगी तुम्हारे सामने खड़े रहनुमाओं के मोटे नकाब जो दीखते नहीं बुत छुपा लेते हैं उनकी बेखौफ फितरत जो तुममे मुझमे और न जाने कितने और मासूम दिलों में   भर रहे अपना ही जहरीलापन जानती हूँ तुम अभी उसी ताने बाने से घिरी होगी जहाँ है सहानुभूति का तिलस्म , कोरी महत्वाकांक्षाओं का जाल और सबसे दूर कर अपनी तरह बिना रीढ़ का सरीसृप बना देने का उनका जूनून जानती हूँ वो रोज लपेटेंगे तुम्हे अपने लिजलिजे हाथों से उन्ही झूठे वादों के आगोश में शब्द चुराते चुराते शायद तुम बन बैठी होगी कल्पना में महादेवी , महाश्वेता , तसलीमा और इस्मत आपा भी जानती हूँ फेंक दिए गए होंगे तुम्ह...

चार लम्हे सत्रह साल

तो क्या हुआ सफर जो अधूरा  रहा शौक आशिक़ी का कर गए तुम जाते जाते तुमने खिलाये तबस्सुम होंठों पर सजाये गीत  बिछती चांदनी के शब्द ओस बन पिघलते रहे नज़्म सजाते रहे रात के तुम जाते जाते हसरतों की  लम्बी चादरें तन्हाईयों को भिगोती  रहीं खिल से उठे शर्मा भी गए कुछ भरम मे जीने का देते रहे तुम  जाते जाते लमहों को गुजरना ही था अश्क़ बनके बह गए फूल गीतों के काँटो से भर गए तुम जाते जाते सिमट गयीं चांदनी और फूलों की बारात तुम्हारे साथ साथ दे गए कुछ नये ग़म तुम जाते जाते बातें  ख़ुद जो नहीं कहीं कभी जफ़ा की ग़ैरों से सुना गए तुम जाते  जाते सत्रह सालों को सत्रह लम्हों मे जिया तुमने और हम लम्हों को जिंदगी बना बैठे ना थे वादे और ना शिकवे शिकायत शूल  से चुभ  गए मग़र तुम जाते  जाते

पूरब जाग रहा है

धुएं के बीच ओसारे से उठती मक्के की रोटियों की गंध खलिहान की और बढ़ रहे हैं पैर, टुनटुन करती बैलों की  जोड़िया.. तीसरे पहर के बीतते बीतते बांग देते मुर्गे कहते हैं...पूरब जाग रहा है. फूटपाथ पर फ़ैल रही है रौशनी रात की धर्मशाला बन जाती है सुबह में सड़क रौंदती हैं कारें रिक्शों का संतोष ठेले खींचते पीढ़ियों के जख्मी हाथ कहते हैं पूरब जाग रहा है.. गलियारों से उठती है आवाज़, खेतों से निकल रही चिंगारी, फूटपाथ से सड़क तक फ़ैल रही है आग, बजा रहें हैं बिगुल, शहरों की मांए और बैलों के भाई थर्राते हुए आतंक के खंडहर कहते हैं...पूरब जाग रहा है..

क्या करें नुमाया कर गए

Image
आजकल मेरी लड़ाई चल रही मेरी कलम से..जब भी दिल में जज्बातों की आंधियां उठती हैं..डायरी की तरफ देखती हूँ..फिर पेन छुपा देती हु..चादर ओढ़ कर छुपना चाहती हूँ खुद से, अपनी कलम से और उन आँधियों से भी जो मुझे मन का गुबार कागज़ पे उतारने के लिए मजबूर करना चाहती हैं.. हो तो गया जो होना था..या शायद वही नहीं हो पाया..बचपन में एक शिक्षक से सुना था..ओ मेरे अहबाब क्या करें नुमाया कर गए..बी ए  हुए नौकर हुए ..पेंशन मिली और मर गए.. ..बड़े होने पर एहसास हुआ हमारे दौर में ये बी ए होने से नौकर बन जाने की काबिलियत नहीं आती..सन २००४..फ़ाइनल एक्जाम का समय..ध्यान किताबों से ज्यादा न्यूज़ पेपर के जॉब्स वाले पन्नो पर रहता था. ..फिर शुरू एक नया दौर संघर्ष का..संघर्ष पहले भी था लेकिन आयाम दुसरे थे..स्कालरशिप की टेंशन..पापा के मनी आर्डर की टेंशन, मासिक और त्रैमासिक परीक्षाओं के नम्बर..पॉकेट मनी के लिए ट्यूशन वगैरह..लेकिन स्कालरशिप आते ही बहार आ जाती थी.. नौकरी की जद्दोजहद कुछ अजब होती है..इसका आपके स्कूल और कॉलेज इम्तहान में अव्वल आने से कोई सरोकार नहीं..प्राइवेट नौकरियों के साक्षात्कार में स्मार्ट दिखना जरु...

आदत

वो आये मेरे पास फूलों की सौगात लेते हुए.. ये तो उनकी आदत है.. मुस्कराते हैं वो  मुस्कराहट देते हुए.. ये तो उनकी आदत है.. वो जो फूल सजा जाते हैं उनके नीचे हम कांटे छुपा देते हैं.. क्या करे आदत है.. हम कांटो सा चुभ जाते हैं.. कसक कर उनको भी रुला जाते हैं.. ये हमारी आदत है..