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अदृश्य

सब कुछ तिलस्म था नाम, पता, फोटो ओर कविताएं भी शायद लोग यूं ही बातों बातों में उलझ बैठे कोई डाक में चिट्ठियां छोड़ बैठा कोई कोई उधार की शायरी पर दिल गंवा बैठा अजीब शख्स था बस झूठ ही बता पाया मगर  नमक के शहर का कोई पता नहीं होता किताबों की दुकानें किसी का घर नहीं होते नाम लगा लेने से हर कोई राहत इंदौरी नहीं बन सकता  शब्द की दरकार है शेर पढ़ते चलो  पंक्तियों के बीच खत का मजुमन ढूंढना पाठक का काम नहीं  शायराना इश्क़ महज़ जज्बात हैं  हर गली में कोई न कोई मकान उनका आशियां बन ही जाता है

औपचारिक

आखिरी बार अपना दिल समेटने से पहले हम उसकी पेशानी चूम लेना चाहते थे उसे आगोश में भरना चाहते थे उसके बालों को सूंघना चाहते थे उसके वजूद को अपने दिल ओर दिमाग में हमेशा के लिए जज़्ब कर लेना चाहते थे ओर ये सब हमने किया सिर्फ खामोश रहकर  अपनी नजरों से ताकि वो परेशान न हो उसका कहना है हम दोस्त हैं अब मेरे ओर उसके बीच इन औपचारिकताओं की जरूरत नहीं 

sirf mard

अब बस करो अधूरे खुदा तुम्हारी कविताएं तिलस्मी हो सकती हैं वजूद वही है एक साधारण सामाजिक  पितृसत्तात्मक  खोखले सामाजिक आदर्श अपनी सुविधा अनुसार ओढ़ी गई बेड़ियां ओर पासवर्ड के साथ छुपाए गए  सोशल मीडिया के इनबॉक्स में  अनगिनत अधूरे झूठे वादों की फेहरिस्त के साथ सिर्फ एक मर्द.....

breathing space

दीवार के दूसरी तरफ वो खड़ा था अपनी शिकायतें लेकर ये दूरी उसका ब्रीदिंग स्पेस थी  जो मेरे लिए अय्याशी हो जाती है उसकी निजी स्वतंत्रता उसका सुरक्षित कवच का  मगर मेरे जिंदगी में कुछ भी रहस्यमय होना उसे डरा देता उसके हिसाब से मेरे लिए क्या अच्छा होगा क्या बुरा  ये तय करना उसकी जिम्मेदारी थी मेरा खुद से कुछ तय करना, सोचना ओर आगे बढ़ जाना बिल्कुल ही गैर जिम्मेदाराना है यार आखिर मैं सुधरती क्यों नहीं वो तो सिर्फ अपनी परिधियों को अलग कर रहा था  ताकि तमाम उससे जुड़े लोग सहज रह सके ओर मैं उसका वो आवरण जहां वो क्षणिक रूप में घर महसूस कर सके जिसकी जरूरत सिर्फ बहुत बहुत थक जाने के बाद होती

मुझे सिर्फ शब्द चाहिए थे

मैने तुम्हे पत्थरों, पहाड़ों, नदी  ओर जंगलों में नहीं ढूंढा पता था तुम वह नहीं मिलोगे मैने ढूंढा तुम्हे अपार भीड़ में,  जहां इन्सान गीत गाते हैं इंसानियत का मैने ढूंढा तुम्हे हर जश्न ने  जहां जीत ओर संघर्ष दोनों के ही गीत गाए जाते हैं मैने तुम्हे मिट्टी खुद कर निकले  लकड़ी के उस टुकड़े में नहीं ढूंढा जिसकी आकृति में लोग खुदा ढूंढने लगते हैं मैने सिर्फ चाय की दुकान पर, नुक्कड़ वाले मोड पर, ओर लाइब्रेरी की सीढ़ियों पर पाया  जहां अक्सर किताबों ओर सोच का मेला लगता है मुझे जो चाहिए था वो थे सिर्फ शब्द... ओर मैं समझ पा रही शब्दों का कोई शहर नहीं होता  कोई पता नहीं कोई ठहराव नहीं  ये तलाश अब यही खत्म होती है...

yu hi mil jao

ना जाने कहां कहां किस कदर ढूंढा तुम्हे ए जिंदगी अब यूं ही मिल जाओ तो अच्छा है एक अरसे के बाद तलाश की हिम्मत नहीं रहती@gunjanpriya.blogspot.com

तुम्हारे शहर का पता नहीं है मेरे पास

तुम्हारे शहर का पता नहीं है मेरे पास मैं अमृता प्रीतम नहीं  कि उम्र की सारी चिट्ठियां उस शहर को लिखूं  जिसका पता ही मेरे पास नहीं तुम्हे लौटना हो तो दरवाजे खोल कर कदम बढ़ाना होगा ओर अगर सामने वाले का इंतजार कर रहे  किसी बेवकूफ शुतुरमुर्ग की तरह  तुम्हे याद दिखाया जाए कि दरवाजे तुम्हारी तरफ से बंद हैं उफ्फ इंसान इश्क के अलावा भी कोई बेवकूफी कर सकता है क्या  यकीन नहीं होता