नवदुर्गा का अवतार आज की औरत
वो खींच के लगाती है काजल,
उम्र को एक हाथ से जकड़ते हुए,
दूसरे हाथ में आरती का थाल,
परंपराओं की डोर
ओर कंप्यूटर का की पैड थामे,
सहस्र भुजाओं से संभालती
पृथ्वी के बनते बिगड़ते समीकरण
ओर जमीं पर हल्की सी थाप दे,
मुस्कराती है मंद मंद,
ताप, शीत सहते हुए,
वर्जनाएं, कटूक्तियाँ किनार कर
अपने आंचल से, दिये की लौ सी
अपने बच्चे को थाम कर
हाथ आगे बढ़ा देती है...
आज की औरत,
जैसे नवदुर्गा का अवतार
हर दिन हर बार
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