राह में

आरज़ू तो यही थी कि 
मुकम्मल इश्क़ मिले या ख़ुदा 
मगर बीच में आ मिले
अनगढ़ राह के पत्थर से तुम...
 न तुम्हे इश्क़ आता है न ख़ुदाई 

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