नींद भी ओर चैन भी

इश्क़ में नींद उड़ जाती है ओर चैन भी ये बहुत के मुंह से सुना था। पता नहीं ये वाला इश्क़ कौन सा होता है मुझे तो इतनी नींद आती है कि शायद इश्क़ का स्कोप ही नहीं बचता। बहुत दिन पहले किसी ने मुझे भस्मासुर कहा सिर्फ इसलिए कि मैं 8 बजे शाम में ही सो गई थी। अब कैसे बताएं कि हम बिहार के जिस गांव से हैं वहां तो 8 बजे रात हो चुकी होती थी। लोग खाना खा कर चूल्हे की आग भी बुझा चुके होते थे। 
हालांकि हमारे गांव में 4 बजे सुबह सुबह इतनी चहल पहल हो जाती है जितनी दिल्ली में 11 बजे तक भी न होती।  वहाँ तो पौ फटते ही किसान अपने खेतों की ओर बढ़ जाते ओर घर की औरतें राख से चूल्हा लीप कर कम काज की शुरुआत कर चुकी होती। गाय बैल को सानी पानी  देना, स्कूली बच्चों के लिए नाश्ता ओर टिफिन पैक करना सब इसी वक़्त होता ओर साढ़े छह बजे तो हम लोग स्कूल भागते होते थे। देश के पूर्वी हिस्से में सब कुछ जल्दी जल्दी होता है सुबह भी ओर शाम भी । तब कहा पता था 4 बजे सुबह उतने की आदत दिल्ली में इतनी बोरिंग लगने लगेगी। 
अब तो सुबह 2 घंटे का समय इतना ज्यादा फ्री लगने लगता है। कभी उठ कर किचन में जाती हूं तो लगता है अभी नहीं अभी पड़ोसी परेशान हो जाएंगे कुकर की आवाज से । वो तो शुक्र है ये मुहल्ला ही नौकरीशुदा लोगो का है तो 6 बजे तक सब अपनी दिनचर्या में लग चुके होते हैं ओर बर्तन की खनक हर घर से आने लगती है। कुकर की सीटी की आवाज, चाय के लिए अदरक कूटने की आवाज ओर आमने सामने की बिल्डिंग से दूर तक फैलती हुई ताजी दाल ओर सब्जियों की महक बता देती है कि चलो दिल्ली जाग उठी अब।
रोज की भाग दौर तो उन लोगों के लिए है ही जिन्हें काम पर जाना है रोजी रोटी कमानी हैं और ऐसा तो हर तबके के साथ है फिर कौन हैं वे लोग जो कहते हैं सुबह सुबह तंग मत करो। रात के 11 बजे उनका दिन शुरू होता है ओर सुबह के दो नहीं नहीं, दोपहर के दो बजे उठ जाते हैं ये निशाचर? 
सुना है अदानी अंबानी के घर में भी तड़के उतने की परंपरा है। तो मतलब अमीर होने ओर लेट से सोने जागने के बीच कोई पारस्परिक संबंध नहीं है। फिर तो ये लेट से सोने का लाइफस्टाइल उन मिलेनियल्स का ही हो सकता है जो रात की ड्यूटी करते हों या जेन जी वाले बच्चे जो अभी अभी स्कूल कॉलेज की गिरफ्त से छुटे हों ओर बेरोजगारी का  लुत्फ उठा रहे हों। हां उनके पास शायद थोड़े वक्त के लिए ही सही चैन भी है ओर नींद भी ।  मगर इस बात से मुझे क्या । अब 6 बजने ही वाले हैं ओर ब्लॉग में अपनी दुनिया भर की भड़ास निकाल  कर ही मुझे चैन मिल गया है। मुझे तो अब ड्यूटी पे जाना है तो मैं चली अपनी दाल चढ़ाने बाय बाय।

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