तुम सिर्फ एक प्रोप

जिंदगी की बिसातें बैठी हुई हैं शतरंज की तरह
मैं तुम वह ओर वे सारे लोग सिर्फ एक प्रोप....!
मेरी कहानियों में तुम कहीं नहीं जो अब
अंदर जो ज्वार उमड़ता है हर चीज हर बात ओर हर इंसान के साथ तुलनात्मक अध्ययन का  उसमें तुम सिर्फ एक पैमाना बन कर फ्लैशबैक में गुजर जाते हो...
 हां कहानियां वही हैं, सड़क।पर चलते हुए 
साथ भागमभाग की, दोसे के अंदर के आलू गायब  होने की 
ओर नारियल पानी पीते वक्त स्ट्रॉ फेंकने की
मगर तुम अब सिर्फ एक प्रोप बन जाते हो...
हल्की हल्की बूंदों में मिट्टी की सोंधी महक चीखती है 
उस ओर खींचती है खिड़कियों के  भूले बिसरे पर्दे में वो तमाम झलकियां
मगर कहीं भी तुम नहीं सिर्फ तुम्हारा नाम एक प्रोप....

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