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मिटते हुए शब्द

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उच्छवास

उदासी तुम्हारे न होने की रोज रोज खुद को याद दिलाती है  हमे किसी के लिए नहीं जागना अब देर रात तक वो देख सुबह होने को आती है कुछ थमा सा है फिर भी द्वंद बन कर  दिल और दिमाग दोनों जाना नही चाहते  अब और कहीं चल बस कर  धुंध से उभरते हो कैनवास और किताब की पंक्तियों में सांस से निकलते हो एक उच्छवास बन कर

दृष्यांतर

तुम्हे प्यार करके देखा था... तुम्हे अपनी दुनिया बना के भी देखा  तुमसे अपनी हसरतें जोड़ कर देखा और  तुम्हारे सपनो को खुद भी जी के देखा तुमको पास आते देखा था तुमको दिल पर कब्जा जमाते देखा था तुम्हारे छलावे को भी देखा था  और तुम्हे दूर जाते भी देखा था इश्क़ है आम भूख की तरह ही भूख  भी तभी तक लगती है  जबतक खाना मिलने की उम्मीद रहती है  एक हद तक भूखा रहने के बाद इंसान  सिर्फ जीता है, खाना नही ढूंढता एक हद तक प्यार करता है  और फिर प्यार की शिद्दत नही रहती  छीजते हुए उस इंद्रधनुष को अब देख रही हूं दिल से मिटते हुए वे सवाल अब देख रही हूं तुम वहीं हो हम भी वहीं  बस खुद को खुद में सिमटते  अब देख रही हूं।

दही जमा ही रहेगा

कुछ दिन पहले हमने मुंह में दही जमने की बात क्या की लगता है सारा सिस्टम ही जम गया। सरकार है की जमी हुई है। सुशासन चल रहा और हर तरफ राम राज्य है। अगर आपकी बुद्धि खुली हुई है तो सबकुछ सही चल रहा, जमे हुए दही की तरह। क्योंकि दही का जम जाना ही सही होता है ये तो आप जानते हैं। कमाल का उदाहरण है। लोकतंत्र के सफल और असफल होने की सारी परिभाषा ही बदल जायेगी। और इस नई परिभाषा के आविष्कार के बाद मुझे लगता है मुझे भी अब राजनीति में कूद जाना चाहिए। पर प्रोब्लम सिर्फ उन लोगो की है जो गोदी मीडिया नही देखते। उनको रवीश कुमार की बातें अच्छी लगती हैं और वो इस घोर सतयुग में भी बुराइयां खोजते हैं। आप किसी एक पार्टी के प्रवक्ता की बात पर किसी देश का बॉयकॉट कैसे कर सकते हैं। लगता है अरब देशों को सोने की चिड़िया की कद्र नहीं। हमारे पास क्या नही है। अगर वो हमारा बहिष्कार करेंगे तो उनका घाटा है। बाकी हमको तो इस देश में कुछ होता गलत लगता ही नहीं। जो हो रहा वो इंटरनल है भाई सब। आंतरिक नीति, समझे कि नहीं। हम कश्मीर को लद्दाख बनाए या पाओभाजी में आइसक्रीम मिलाएं आपको क्या? देश विदेश में हमारी जय जय हो रही। यूक्रेन और...

दही जो लगा है छूटता नहीं

🥛 ये एक ग्लास दही है और दही के लिए कुछ बड़े अच्छे विचार दिमाग में आ रहे। कभी पढ़ा था दही जो लगा है वो कहीं छूटता नही। मतलब एक बार जो जुड़ गया वो भूलता नहीं। किसी पुराने परिचित से मुलाकात हुई और बरबस ही याद आ गया। बाकी ग्लास तो हमने इमोजी से लिया है और होने के लिए ये दूध भी हो सकता है। पर आजकल सबकुछ मानने पर है। मानो तो देव नही तो पत्थर। अब हम तो पत्थर ही मानते हैं और पत्थर से बहुतों का भला हो सकता है। पहले जमाने में लोग कुटाई पिसाई कर लेते थे, आजकल दंगा फैलाने में काम आता है।  दंगा फैलाने से याद आया कल बेटी को कोई गृहकार्य मिला था स्कूल में उसको होमवर्क बोलते हैं। पर हम अगर गृहकार्य न कहें तो आप कहेंगे हम हिंदी भूल गए, और अगर होमवर्क न कहे तो पल्ले नहीं पड़ेगा कई लोगों के। तो उस गृहकार्य में कुछ ऐसे शब्द थे जो सही नही लगे मसलन हिंदू, मुसलमान, पत्थर और लाठियां, छोटे बच्चे मिलकर एक नाटक कर रहे और उसकी विषय वस्तु में शब्द बहुत डरवाने लग रहे। खासकर इस माहौल में जब किसी को फोन करके ईद मुबारक कहने से भी डर लग रहा। हमने तो अपने दोस्तो को उलाहना भी नही दिया की सेवई नही खिलाई।  खैर म...

वजह तुम हो

हर रोज की तरह खुद से किए गए वादे तोड़ते हैं की तुम्हे कभी याद नहीं करेंगे हर साल एक रेजोल्यूशन बनाते हैं कि तुम्हे कभी उतनी जगह नहीं देंगे की तुम आंसुओं का समंदर बहा सको हर रोज उम्मीद करते हैं तुम्हारे नाम के साथ  कोई टीस न महसूस हो  हर रोज भूल जाते हैं अपनी बेकार कोशिशें इन तमाम बातों में अफसोस है अभी तक तुम ही नजर आते हो हां हर बात की वजह तब भी तुम थे और अब भी...

मुझे नहीं आता

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