ये भी शब्द ही हैं...

शब्द जो एहसास कराते हैं...
किसी के होने का,
किसी के दुलारने का,
खयाल रखना,
पहुंच कर मैसेज कर देना,
ठीक हो...?
खाना खाया क्या..?
सो रहे हो...?
घर पहुंच गए...? 
दवा ले ली क्या...?
और फिर ये भी
बात नहीं कर पाएंगे...
फिर अभी व्यस्त हूं...
बाद में बात करते हैं...
 ये भी शब्द ही हैं...
तुम मेरा घर हो.. 
मैं हूं ना... 
से लेकर 
मैं घर पर हूं बाद में बात करते हैं तक ...
सब कुछ शब्दों में ही तय होता है...!
किसी का आना,
अपना सा बन जाना,
दूर रह कर भी घर सा हो जाना
ओर फिर दूर ही हो जाना
सब शब्दों की जादुई नगरी में 
बनना बिगड़ना कई खेलो की तरह
जिंदगी इन्हीं शब्दों में करवटें बदलती है
हैं मगर ये सब मात्र शब्द ही...!!!

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