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Showing posts from March, 2025

sukhe huye gulab

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सुना है पूरी दुनिया भटक कर अब तुम अपने शहर जा रहे ये भी अच्छा है वैसे वापस लौटना  बहुत मुश्किल होता है ज्यादातर लोगों के लिए जड़ से उखड़े गमले में रोप हुए पौधे  कहां आ पाते हैं वैसे नहीं आ पाती हैं मायके  ज्यादातर ससुराल बसी लड़कियां  किचेन में चुपचाप सांस रोके,  बर्तनों को बार बार धोने के बहाने आंसू रोकती लड़कियां तुम्हारी बाड़ी में भी तो हैं कई पेड़ पौधे  ओर गमले में लगे सूखे गुलाब हां तुम समझते नहीं गमले में लगे सूखे गुलाबों का दर्द इस बार एक नया पौधा लेते जाना तुम भी गुलाब का ओर फिर पूरी जिंदगी शिकायत करते रहना  गुलाबों के कांटों, नखरों ओर सूख जाने के @gunjanpriya.blogspot.com

aa gaya basant

आ गया बसंत भूला शिशिर का आघात हर पेड़ खड़ा है लेकर नए पल्लव पात  रास्तों में बिछी है पुराने पत्तों की चांदनी  लाल है पलाश ओर शिमुल की बांधनी  सुबह की अरुणिमा से होड़ करते गुलमोहर  चाक  चाक हो उठा बीते मौसम का पतझड़  बदल गई है कोयल की कूक ओर पपीहे का संगीत  बदल गए इस बसंत मन के भी मीत  @gunjanpriya.blogspot.com

purush ko stri kab tak achi lagti hai

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पुरुष को स्त्री तबतक अच्छी लगती है  जबतक वो रूप का सागर बनी रहे हाथों में रसोई ओर गोद में बच्चे लिए रहे  सदियों से तलवार लेकर खड़ा पुरुष गलत लक्ष्मणरेखाएं खींचता आया है स्त्रियों के लिए ओर इसलिए उस दिन वही स्त्री अप्रिय हो जाती है जब हाथ में कलम ले उसके समकक्ष खड़ी हो जाती है और बताती है कि उसके जीवन की परिभाषाएं वो खुद लिख सकती है 

samajhdar aurten

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इस बार भी  कोई अलग नहीं था उसका पूछना  मै आ जाऊ  और फिर हां कहने पर  अपनी व्यस्तता दिखाना  ओर कहना फुर्सत तो नहीं पर आके निकल जाऊंगा...  जैसे उसके आने तक पृथ्वी घूमना बंद कर देगी हवाएं अपना रुख मोड लेंगी और  मेरी जिंदगी  जिसे मैने गलती से फिर से सम्हालने की  कोशिश कर ली हो  फिर से एक आहट पर सुनामी बन जाएगी

jane do

खुद से खुद को रोकना,  आंखों से बह जाने देना सारी शिकायतें सपने ओर उम्मीदें पोंछ लेना एक बार फिर से  अपने सुर्ख हुए गाल आस्तीन से रगड़कर चेहरे को।सामान्य दिखाने की कोशिश ओर मुंह घुमा कर कहना सब ठीक है बिना किसी शिकायत के  अब हमारे दरम्यान कुछ भी नहीं बचेगा बिना झिड़कियों के तुम्हारा खयाल रखना भी  कोई मायने नहीं रखता सहज और सामान्य प्रीत किसे अच्छी लगती है तुम्हे हमेशा सबकुछ तूफानी चाहिए था  बिना परिभाषा के  मुझे परिभाषाओं में बंधी सुनामी अगर मैं नदी बन गई होती  तो फिर भी तुमसे होकर गुजर जाती पर तुम्हे पहाड़ या समंदर भी कहां बनना था छद्म हम दोनों के बीच खामोशी की दीवार ला रहा था  एक झटके में देखो अब सबकुछ कितना साफ स्वच्छ खाली सा दिख रहा  उफ्फ कितनी जटिलताएं थीं इस प्रेम में  इसे अब जाने देना ही था....@gunjanpriya.blogspot.com

miyaad

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फिर अचानक दर्द कम सा होने लगा  आहिस्ता आहिस्ता शायद सारी चुभन की मियाद यही तक थी अवसाद आज भी है  बादलों की तरह कहीं दूर  उस पहाड़ के पीछे 

usko bhi vida kahna nahi aata

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इस बार भी  कोई अलग नहीं था उसका पूछना  मै आ जाऊ  और फिर हां कहने पर  अपनी व्यस्तता दिखाना  ओर कहना फुर्सत तो नहीं पर आके निकल जाऊंगा...  जैसे उसके आने तक पृथ्वी घूमना बंद कर देगी हवाएं अपना रुख मोड लेंगी और  मेरी जिंदगी  जिसे मैने गलती से फिर से सम्हालने की  कोशिश कर ली हो  फिर से एक आहट पर सुनामी बन जाएगी 

मैं दो मिनट का मौन रखूंगी

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मैं दो मिनट का मौन रखूंगी तुम्हारे ओर मेरे लिए  उन तमाम बातों के लिए जिनका जिक्र करते हुए  बहुत सालों बाद बहुत हंसी आएगी सचमुच कितनी बेवकूफियों भरी बातें थीं  मगर अभी ऑफिस का टाइम हो रहा है अभी मुझे बर्तन धोने हैं और घर की सफाई करनी है अभी जाते जाते मुझे छुट्टियों मे बच्चे के ट्यूशन का इंतजाम करना है रस्ते में रात की बची रोटियां  रेड लाइट पर किसी भिखारी को देने के लिए पैक करनी हैं अभी बहुत काम है दोस्त  इसलिए दो मिनट का मौन काफी है  या इंस्टाग्राम पर एक कविता तुम्हे अर्पित कर दूं इंप्रैक्टिकल, बेसिरपैर का प्रेम न तुम्हारे काम का है न मेरे पास वक्त है उसे सही जगह सहज कर रखने का  चलो दो मिनट का मौन रख लेना तुम भी  ओर निकल पड़ना अपने अगले गंतव्य की ओर 

apriya striyan

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पुरुष को स्त्री तबतक अच्छी लगती है  जबतक वो रूप का सागर बनी रहे हाथों में रसोई ओर गोद में बच्चे लिए रहे  सदियों से तलवार लेकर खड़ा पुरुष गलत लक्ष्मणरेखाएं खींचता आया है स्त्रियों के लिए ओर इसलिए उस दिन वही स्त्री अप्रिय हो जाती है जब हाथ में कलम ले उसके समकक्ष खड़ी हो जाती है और बताती है कि उसके जीवन की परिभाषाएं वो खुद लिख सकती है
जिन राहों पर तुम कभी चले ही नहीं वहां लौट आओ कहना सही नहीं होगा ये किसी ओर की गलतफहमी होगी तू  इस सफर में कभी नहीं होगा@gunjanpriya.blogspot.com

ab ye mat kaho tum

अब ये मैं हूं ना कहना बंद कर दो तुम ये कंधे पर हाथ रखना ओर भरोसा देना, वो भीड़ में धक्के से बचाने के लिए आगे खड़े हो जाना सड़क पार करते वक्त हाथ पकड़ लेना छोड़ दो तुम ये गाड़ी की सर्विसिंग में करवा लूंगा, सायकिल मैं संभाले लूंगा, पंखे साफ कर लूंगा, बेड खिसका दूंगा ये सब बकवास बंद करो ये मत कहो कि तुम अब भी खड़े रहोगे मेरे साथ  मुझे खुद से वापस मुड़ कर देखना है अपने रस्ते, अपनी जिंदगी अपने नक्शे कदम सही सुरक्षित और सम्हाल कर हर कदम खुद से रखने हैं तुम्हारी इस जिद का कोई औचित्य नहीं  क्योंकि तुम्हे स्वतंत्रता अच्छी लगती है स्वतंत्र औरत नहीं। अब ये मैं हूं ना कहना बंद कर दो तुम

poornviram

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शब्द कभी कभी कुछ भी नहीं कह पाते... और मौत किसी भूमिका का मोहताज नहीं क्यूंकि यहां सिर्फ पूर्णविराम होता है @gunjanpriya.blogspot.com

beintahan shikayten

तुम.... निभा नहीं सकते इसलिए छोड़ना चाहते हो  पर कहीं ओर देखूं ये तुम्हे बर्दाश्त नहीं किसी ओर की दरकार हो ये तुम्हे बर्दाश्त नहीं कोई ओर मेरे सपनो में, दुख में दर्द में शामिल हो  ये भी तुम्हे गँवारा नहीं हाथ बढ़ाना चाहते हो पर साथ नहीं साथ होना चाहते हो पर बंधन नहीं चाहिए ओर मेरी जिंदगी की हर बात गलत है  कहकर मुझे बदलना चाहते हो  पर ये बात कहीं तुम्हारी जिंदगी न बदल दे  इस बात से डरते हो अरे बता तो दो तुम चाहते ही क्यों हों ओर चाहते क्या है तुम्हे मेरी कविताओं से भी शिकायत है  क्यूंकि वो निहायत ही बेपर्द हैं तुम जो दुनिया के तमाम रिश्तों की बुनियाद पर सवाल उठा सकते हो पर कोई तुम्हारी परिभाषाएं ओर परिधियों को पूछे  तो तुम मौन हो तुम जिसे रोटी बेलने का शऊर नहीं  हमारी रसोई में निशान ढूंढते हो  तुम जिसे बंधन समझते हो हमारे यहां उसे परिवार कहते हैं तुम इतने दुराग्रही कैसे हो सकते हो या तुम्हारे तमाम नर्मियां सिर्फ खुद के साथ जुड़ी हैं ओर दूसरों के लिए पूरे उत्तर प्रदेश की व्यंग्योक्तियाँ ले आते हो आर या पार की भाषा कब समझोगे। प्रेम बढ़ सकता है उ...
यहां इस महानगर ने सबकुछ उलझा उलझा सा है जाओ कहीं दूर तुम अब बहुत दूर जहां सूर्योदय ओर सूर्यास्त का फर्क समझ आए @gunjanpriya.blospot.com

bhookh

Ye mithaiyan or chocolate jo tum late ho unke darkaar hame kabhi nahi thee..jab ham kahte hain man nahi lag raha tum hamesha bhookh kyu samajh lete ho @gunjanpriya.blogspot.com

कितनी आज़ादी

औरत को खुल कर लिखने की भी आजादी नहीं तुम उसे बेवफा कह दो, बेमरौवत, ओर न जाने क्या क्या एक बार मुस्कुराएगी चूल्हे की तरफ मुंह फेर लेगी खोलती दाल की भाप में  चेहरे पर भी पिघलता हुआ सा कुछ गिर जाएगा अनायास फिर एक प्याज उठाकर कहेगी उफ्फ बहुत तीखी गंध है इसकी यकीन मानो औरत की तरह प्रेम करना मुश्किल है उसने आंचल में सिर्फ दूध ओर आंखों में पानी नहीं समेटा जज्बातों और सपनो को भी चूल्हे की लिपाई करते वक्त पोंछ दिया है तुम सिर्फ कविता लिखने के लिए इश्क ढूंढोगे ओर  वो खुद एक पिघली सूखी हुई इबारत
पता नहीं था अपने हिस्से का आसमान इतना तंग ओर बंधा बंधा सा होगा...इस शहर ने कुछ दिया तो बहुत कुछ छीन भी लिया