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क्या करें नुमाया कर गए

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आजकल मेरी लड़ाई चल रही मेरी कलम से..जब भी दिल में जज्बातों की आंधियां उठती हैं..डायरी की तरफ देखती हूँ..फिर पेन छुपा देती हु..चादर ओढ़ कर छुपना चाहती हूँ खुद से, अपनी कलम से और उन आँधियों से भी जो मुझे मन का गुबार कागज़ पे उतारने के लिए मजबूर करना चाहती हैं.. हो तो गया जो होना था..या शायद वही नहीं हो पाया..बचपन में एक शिक्षक से सुना था..ओ मेरे अहबाब क्या करें नुमाया कर गए..बी ए  हुए नौकर हुए ..पेंशन मिली और मर गए.. ..बड़े होने पर एहसास हुआ हमारे दौर में ये बी ए होने से नौकर बन जाने की काबिलियत नहीं आती..सन २००४..फ़ाइनल एक्जाम का समय..ध्यान किताबों से ज्यादा न्यूज़ पेपर के जॉब्स वाले पन्नो पर रहता था. ..फिर शुरू एक नया दौर संघर्ष का..संघर्ष पहले भी था लेकिन आयाम दुसरे थे..स्कालरशिप की टेंशन..पापा के मनी आर्डर की टेंशन, मासिक और त्रैमासिक परीक्षाओं के नम्बर..पॉकेट मनी के लिए ट्यूशन वगैरह..लेकिन स्कालरशिप आते ही बहार आ जाती थी.. नौकरी की जद्दोजहद कुछ अजब होती है..इसका आपके स्कूल और कॉलेज इम्तहान में अव्वल आने से कोई सरोकार नहीं..प्राइवेट नौकरियों के साक्षात्कार में स्मार्ट दिखना जरु...

आदत

वो आये मेरे पास फूलों की सौगात लेते हुए.. ये तो उनकी आदत है.. मुस्कराते हैं वो  मुस्कराहट देते हुए.. ये तो उनकी आदत है.. वो जो फूल सजा जाते हैं उनके नीचे हम कांटे छुपा देते हैं.. क्या करे आदत है.. हम कांटो सा चुभ जाते हैं.. कसक कर उनको भी रुला जाते हैं.. ये हमारी आदत है..

आसंग

तुम्हारे कमरे में हर चीज अपनी लगती है... गन्दी चादर... टेबल पर राखी बेतरतीब किताबे .. कुर्सी पर पड़े तुम्हारे उलटे मौजे ... किचन में जूठी चाय की प्यालियाँ और थालियाँ.. और अभी अभी उतारी तुम्हारी शर्ट, जिसमे तुम्हारे पसीने की गंध भी है..                                                                   हाँ, मुझे अहसास है कि ये मेरा कमरा नहीं..                          कि वक्त ढलने से पहले मुझे चले जाना है...                           की घडी की सुइयां हमेशा डिगाती रहती हैं,                            यहाँ के अपनेपन को अपनी रफ़्तार से .                         ...

एक अनजान चाहत के लिए..

दिन को खुद से गुजरना था. .मैंने भी खुद को गुजार दिया दिन की तरह.. नहीं मालूम तुम्हारी उदासी का सबब क्या है.. आजकल दिल तुमसे पूछकर उदास होना चाहता है..

दू बटा दू के जिनगी

दू बटा  दू के जिनगी ई फ्लैट नंबर वाला दोस्त सभ  ....ई शहर केर जिनगी दू बटा दू सन.... ने कोनो नाम छैक लतामक गाछ के ने नबकी काकी केर गाईर सुनि होइत छैक एतय भोर   ने लालकाकी केर मेही पिरिकिया भेटत एतय  ने पुर्णी पोखैर केर मखान आ माछक झोर  रहैत  तय छी कतेको बरख सं मुदा एखनो एही शहर के नहि छी हम   परिजन के छोड़ी  छाईर जीबैत छी टुगर टापर जकां जाहि गाम के बिसरि  बैसल छी आन लोक  बनिकय  कहिया सं  सर्टिफिकेट  में देखबैत छी स्थायी निवास कहि कय  काल्हि कियो फ़ोन कय क पूछलक कि घरक लोक के समाचार कहू   सोचय लगलाऊ जे घर तय छुटि गेल पाछा गामे में एतय देवालक ओट में जीबैत छि दीवार बनिकय.... 

मैं तुमसे दूर जाना चाहती हूँ

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मैं तुमसे दूर जाना चाहती हूँ भूल जाना चाहती हूँ कि मेरी हर बात में हो तुम तुम, तुम्हारी बातें, तुम्हारा हँसना, तुम्हारा रोना, तुम्हारा उत्तेजित होना और तुम्हारी सहनुभूतियाँ जो हर कमजोर नस्ल के लिए उभरती थीं उनमे से कुछ भी अब मेरे सामने नहीं.. और मैं चाहती भी नहीं इन चीजों को अपने आसपास मैं  भूल जाना चाहती हूँ हर चीज को मापने का तुम्हारा पैमाना.. और हर अहसास को जीने का तुम्हारा नजरिया ..शुक्रगुजार हूँ कि तुमने उन रिश्तो को दिया है एक नया मोड़ जिन्हें मंजिल तक ले जाना मुमकिन न था और उन तमाम बातों के लिए जो तुम्हारी वज़ह से मेरे जीने का सबब बनी हैं पर उन तमाम खुशियों, ' हसरतों और चीजों के साथ साथ अपनी यादें भी क्यों नहीं ले लेते वापस क्यों मेरी तमाम जीने की कोशिशों को तमाचा मार देती है तुम्हारी गैर मौजूदगी निकाल ले जाओ अपनी परछाई मेरी रूह से मैं हर उस चीज को भूल जाना चाहती हूँ जिसपर तेरा नाम लिखा है.. हाँ मैं तुमसे दूर जाना चाहती हूँ.

हिसाब ले लो

गम इस बात का नहीं की तुम यहाँ नहीं हो इसका है की हर बात में मौजूद रहता है तुम्हारे न होने का अहसास और हर वक़्त यही लगता है कि मैं खुद को नहीं तुम्हारे गायबाने को जीती हूँ.. मेरी जिन्दगी बन गयी है  तुम्हारे खालीपन का अक्स उसी अक्स को मैं अपने आइनों में भर लेती हूँ तुम्हारा प्यार, तुम्हारे दिए ग़मों के तोहफे और तुम्हारी यादें भारी पड़ने लगे हैं मेरे हर आने वाले लम्हे पर तुम्हारे सपनों को जज्ब किये लेती हूँ अपनी हसरतों में ये फेहरिस्त बड़ी है आंसू भरी बातो की, ज़रा हिसाब ले लो कितनी राते हैं तुम्हारे जज्बातों और मेरी अकेली रातों की..