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बची हुई कुछ चीजें

देखो मैंने तुम्हारी चीजें जो अब तक सम्हाल कर रखी थीं सब फेंक दिया है ये तुम्हारा टिफिन का डब्बा, वो अलमारी मे पड़ा तुम्हारा टॉवल,  वो चप्पल जो जान बुझ कर चुभने वाली खरीदी थी तुम्हारे लिए  वो कुर्सी जिसपर रखे कुशन मे एक छेद है सोफे का वो कोना जहाँ तुम्हारे बगल मे जबरदस्ती घुसने की कोशिश करती थी मै वो सब मैंने नोच नोच कर फेंक दिया है अपने दिमाग से।  बिस्तर पर हमेशा दीवार की तरफ सोना मुझे पसंद नही इसलिए मैंने अब जगह ही बदल दी है।  तुम्हारे डर से सफाई करने के बाद भी हर जगह दुबारा साफ करती थी मै पौछा लगाने के बाद भी फर्श पर पाँव रखते हुए तुम्हारी नजरों मे  डाँट का खौफ होता था।  सरकारी मकान के हर कोने को साफ करना वैसा ही है जैसे कल कंबल को सफेद करने की कोशिश ये जानते हुए भी  अपनी घरेलू कुशलता से तुम्हे खुश करने की असफल कोशिशें मानो मेरा अस्तित्व रसोई और झाड़ू से सार्थक होने वाला हो कच्ची पक्की रसोई पर तुम्हारे आग्नेय नेत्रों मे अपने लिए सहानुभूति ढूँढने की फ़ितरत  सब छोड़ दिया है।  मैंने अब किसी को बेवजह खुश करना, किसी के लिए खुद को गलत समझना ...

अराजक प्रेम

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पूर्ण विराम

ये वाकई मे एक संपूर्ण रिश्ता था  यह सब कुछ निर्द्वंद् था अगाध प्रेम के साथ बिना किसी बंधन के भी हैं जुड़े थे बिना किसी वादे के साथ का अहसास था और मुझे यकीं था कि कुछ और तलाश करने की जरूरत नही थी पर तुम्हारी तलाश अभी बाकी थी शायद  मै उस तलाश को भी अपने इश्क़ का हिस्सा मान बैठी थी हमेशा लगा   कि तुम वाकई हर चीज हमसे बेहतर कर सकते हो और इस कदर आँख मूँद लिया मैंने  कि हर चीज तुम्हारी नज़रों से ही देखूँ मगर ये भूल गयी कि मेरे हिस्से का आसमां  मेरी इस बेइंतहा मुहब्बत मे गुम हो गया कहीं वो आत्म विश्वास, वो दुनिया को  खुद अपनी आँखों से देखने की चाहत  वो उत्तरी ध्रुवी रोशनियों तक पहुँचने की जिद  और अपनी सोच और तालीम को किसी भी मन्दिर, मस्जिद चर्च और गुरुद्वारे मे छुप कर बैठे भगवान् से आगे रखने का सुकून... सब धीरे धीरे पीछे हो गए थे।  शायद इश्क़ की आखिरी इंतहा यही थी शायद हर रिश्ते की  एक मियाद होती है ये स्वीकारने का वक़्त आ गया था--  तुम्हारी बेचैन जिंदगी को अब पनाह की जरूरत नही थी।  तुम्हे और भी आसमां तलाशने थे   अपने ग...

रेशम की डोर

 कभी कभी हमें लगता था, ज्यो तुम्हे  पहले भी कहीं देखा हो  पहले भी कहीं हम  मिले हों,  ----- ज्यों सरयू के किनारे,  चित्तोर के दुर्ग में,  हुमायूँ के मकबरे में  रेशम की चमकती डोर में , एक झलक मिलती थी स्नेहिल  अब जाना वो तुम थे... स्कूल की दीवारों से जुड़े खून के रिश्तों से परे  भाई शब्द का अर्थ बताने वाले.. तुम थे  प्यार के मासूम बंधन से कौन बंधा रह पाता है  बंद  लिफाफों में भरे सूरज और पहाड़ों के  अधूरे चित्रों में कौन रंग भर पाता है   शिवाजी स्टेडियम से लोटस टेम्पल तक  तुम आओ हम सब कर लेंगे का वादा करने वाले भी तुम थे ....

अमावास का टिमटिमाता तारा

 तुम चाहो तो चाँद को छु लो  मैं  झील किनारे ही बैठना चाहती हूँ  लहरों के बीच बनती बिगडती  चाँद की परछाई  देखते रहना चाहती हूँ  मैं डरती हूँ चाँद को छूने से कहीं दाग न लग जाये  बस आईने की ख़ूबसूरती निहारना चाहती हूँ  तुम महफ़िल की  रौनक बनना चाहते हो  मैं अमावास का टिमटिमाता तारा  आसमान की ऊंचाई और झील की गहराई  कुछ ऐसा ही फर्क है तेरी मेरी चाहत में 

जैसे अक्सर हो जाते हैं लोग

 हाँ ये सही है मैं उस तरह सोच नहीं पाती  जैसा अक्सर सोचते हैं लोग. मैं  तुम्हारी हर  एक बात  आशाओं की डोर से गूंथ लेती हूँ  और हर डोर  सपनो की माला बन जाती है.  मैं हर रंग को ख़ुशी की नेमत समझ लेती हूँ  और हर ख़ुशी मेरे लिए इन्द्रधनुष बन जाती है. मैं हर उस कागज़ को कुरान समझ लेती हूँ जिस पर प्यार लिखा होता है  और इश्क  मेरे लिए खुदा की इबादत बन जाती है. पर तुम जानते हो, चीजें अक्सर वैसी होती नहीं,  जैसा मैं सोचती हूँ, जैसा मैं देखती हूँ. तुम्हारे बार बार समझाने पर भी  मैं सख्त जमीन को महसूसना नहीं चाहती,  मैं क्या करूँ, अपने आप को बदल नहीं पाती. उस तरह, वैसा बना नहीं पाती,  जैसी चीजें होती हैं ... जैसे अक्सर हो जाते हैं लोग ...

चांदनी का अमावस

 पता नहीं क्यों डर लगता है  चाँद को देखकर और हसीं चांदनी  शूल बनकर दिल के आर पार होती जाती है  तुम्हारी खामोश ख़ूबसूरती  रातों को खौफनाक नज़र आती है  मेरी आखों की  कशिश  अनजानी तड़प में बदल जाती है  पता नहीं क्यों  डरती हूँ अमावस की कलि ररत न आ जाये  और ये समंदर किसी नदी में न खो जाये  शायद मैं खुद चांदनी का अमावस हूँ