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गुजर गया जो वक्त

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एक दिन मन में आया  किसी बिछड़े हुए को याद किया जाए  फिर बैठ के फुर्सत से कहीं चाय पी जाए  पास से परखा जाए वक्त की राख के नीचे दबे उन नर्म एहसासों को  गुजर गया जो सुकून उसे फिर से जिया जाए   दिमाग़ ने कहा मत करो बेवकूफी फिर से दिमाग़ ने कहा मत करो बेवकूफी फिर से  गुजरे हुए को लौटना फिर से घावों को कुरेदना है सिलसिले टूटने की वजह अभी खत्म कहां हुई है क्यों फिर आंसुओं के सैलाब लिए जाएं मग़र दिल तो दिल है दिल कहा सुनता है दिमाग़ की बातें लगाया फोन बुला भेजा हमने पुराने वक्त को फिर से पुराना वक्त आया उसी अकड़ में ऐंठे हुए  गोया फिर से उसकी जरूरत है किसी को शायद अब भी उसकी दर्द देने की फितरत नहीं समझ पाया है कोई शायद अब भी नचा सकता है वो आज को कल की तरह  बहुत हैरान हुआ मगर अतीत अपने बढ़े कदम के साथ कहीं दिखी नहीं वो खरोचें  सामने था एक वीतराग।  शून्य में हताश हो दौड़ा अतीत फिर से कहीं तो होंगे निशान उसके द्वारा क्षत विक्षत किए एहसासों के चिल्लाया जोर जोर से वो बेवफ़ाई का फरेब लिए  वर्तमान रौंद कर उसकी फितरत अकेला आगे बढ़ गया है।

अच्छा लगता है !

सुनो,  तुम जो ये सुबह सुबह ३ बजे गुड मॉर्निंग की  औपचारिकता करते हो,  अच्छा लगता है!  अपने व्यस्त जीवन मे इंस्टाग्राम की खिड़की और व्हाट्स के रोशनदान से प्यार वाले इमोजी भेजते हो,  बचकाना सही  मगर अच्छा लगता है!  कभी वीडियो काल की जिद करना और कभी फोन पर इजहारे मुहब्बत सुनने की प्रतीक्षा करना  सदियों पुराना सा है  मगर अच्छा लगता है !   और कभी ये कहना कि मै सब ठीक कर सकता हूँ  और कभी दूर होकर भी पास होने की ' फील ' देना  नब्बे के दशक वाला  किसी " इलू इलू" के गीत सा है  मगर अच्छा लगता है ! 

उसी के नाम से अब भी

फिर वही मोड़ आ के मिलता है वो जहाँ सिर्फ दूरियों को रहना था।  ना खैरियत पूछी न हाले दिल अपना कहा  ना जाने क्यों फिर बेमुरव्वत ही मिलना था।  उसी के नाम से अब भी निकलते हैं आँसू  कि जिसके नाम से मुहब्बत का हर ख़्वाब ढलना था।  फ़ितरत उनकी बेरुखी की हमारी आरजुओ पर भारी हैं हमेशा हमही से मुखातिब हो उन्हें हमे ही रुस्वा करना था। 

kavita se khubsurat hai shayri

जाने क्यों कविता से ज्यादा खूबसूरत है शायरी  कविता दर्द का बहाव है तड़प है शायरी कविता प्रेम है  अगर अधूरा सा तो इश्क़ की इंतहा है शायरी कविता अगर मन का गीत है भावनाओं मे पिघलती है शायरी सपनो की उलझन मे बरसती है कविता जरूरत सी है मगर शौक है शायरी जाने क्यों कविता से ज्यादा खूबसूरत है शायरी

तुम्हारे वादे

 तुम्हारे वादे  ओह कितनी हसीं होती है तुम्हारी हर एक बात  जैसे चांदनी रात की शबनम  जैसे तारो ने बरसा दिया हो अपना प्यार जैसे बादलों ने बख्श दी हो हर नेमत  मगर तुम्हारा न आना हर बात को बेमानी बना देता है  हो जाती है सुबह से शाम और फिर दिन से रात  बादलों कि नेमतें जब्त कर लेती है

कोशिशें तुम्हे भूलने की

कोशिशें तुम्हे भूलने की... हर रोज करती हूँ  खुद को याद दिलाती हूँ तुम्हारी तल्ख बातें तुम्हारा हर बात पर मुझे हराने की कोशिश पहले खुद जैसा बनाने की कोशिश और फिर कहना कि मै कौन सा अलग हूँ पहले अपनी कमजोरियां बताना फिर उनका जिक्र करने से नाराज होना पहले दर्द जानना फिर मेरे दर्द का ही मजाक बना देना फिर प्यार से संहालना और धक्का दे कर गिरा देना याद तो ये भी है कि तुमने बिना वादा किये साथ दिया और वादा करके फिर मुकर गए याद ये भी है कि मैंने तुम्हे भूलने की कसम खाई है और रोज रोज कसकती है टीस अपनी ही जिद से हार जाने की  शायद तमाम कोशिशों पर मेरा एकतरफा इश्क़ हावी है और मै अभी भी तुम्हारी यादों को अपनी कैद बनाये रखने मै जिद मे हूँ 

बची हुई कुछ चीजें

देखो मैंने तुम्हारी चीजें जो अब तक सम्हाल कर रखी थीं सब फेंक दिया है ये तुम्हारा टिफिन का डब्बा, वो अलमारी मे पड़ा तुम्हारा टॉवल,  वो चप्पल जो जान बुझ कर चुभने वाली खरीदी थी तुम्हारे लिए  वो कुर्सी जिसपर रखे कुशन मे एक छेद है सोफे का वो कोना जहाँ तुम्हारे बगल मे जबरदस्ती घुसने की कोशिश करती थी मै वो सब मैंने नोच नोच कर फेंक दिया है अपने दिमाग से।  बिस्तर पर हमेशा दीवार की तरफ सोना मुझे पसंद नही इसलिए मैंने अब जगह ही बदल दी है।  तुम्हारे डर से सफाई करने के बाद भी हर जगह दुबारा साफ करती थी मै पौछा लगाने के बाद भी फर्श पर पाँव रखते हुए तुम्हारी नजरों मे  डाँट का खौफ होता था।  सरकारी मकान के हर कोने को साफ करना वैसा ही है जैसे कल कंबल को सफेद करने की कोशिश ये जानते हुए भी  अपनी घरेलू कुशलता से तुम्हे खुश करने की असफल कोशिशें मानो मेरा अस्तित्व रसोई और झाड़ू से सार्थक होने वाला हो कच्ची पक्की रसोई पर तुम्हारे आग्नेय नेत्रों मे अपने लिए सहानुभूति ढूँढने की फ़ितरत  सब छोड़ दिया है।  मैंने अब किसी को बेवजह खुश करना, किसी के लिए खुद को गलत समझना ...