हर्ज़ क्या है
मुलाकातों का सिलसिला जारी रहना चाहिए
आखिर हर्ज ही क्या है...?
जानते हैं हम दोनों के बीच
खेत नदी ओर पहाड़ सब के सब थमे से हैं
इस पार की उलझने उस पार के सपनों को रौंदती सीं
काँटे बस कांटे ही कांटे...
इतने कि जख्मी हो जाएं
इश्क की तरफ ताकते हुए हमारे बेचैन मन
इतने कांटे कि हिम्मते फिर से जीने की
सिसक कर वही कोने में दम तोड़ दें
फिर भी मुलाकातों का सिलसिला जारी रहना चाहिए
आखिर हर्ज़ ही क्या है...
फ़र्क़ पड़ना बहुत जरूरी है
कि तमाम वादे करते वक्त
हम बख़ूबी जानते हैं इनका पूरा होना असंभव सा है
सपनों की फेहरिस्त बनाते हम ओर तुम
बेचारगी पे हंस पड़ते हैं खुद ब खुद
सब बेतुका है... जानते हो तुम
फिर भी पूछते हो उस चुनरी का रंग कैसा होगा
जो खेतों में पसर कर नदी के उस पार मैदानों तक फैल सी जाएगी
सपनों की चांदनी दूर दूर तक
हमारे हौंसलों के सफेद पंखों पर सवार हो उड़ान भरती है
ओर इसलिए थके थके से कदम धीरे धीरे बढ़ते हैं फिर से
क्योंकि कही न कही हम सब यही चाहते हैं
मुलाकातों का सिलसिला जारी रहना चाहिए
आखिर हर्ज ही क्या है...?
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