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तुम सिर्फ एक प्रोप

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जिंदगी की बिसातें बैठी हुई हैं शतरंज की तरह मैं तुम वह ओर वे सारे लोग सिर्फ एक प्रोप....! मेरी कहानियों में तुम कहीं नहीं जो अब अंदर जो ज्वार उमड़ता है हर चीज हर बात ओर हर इंसान के साथ तुलनात्मक अध्ययन का  उसमें तुम सिर्फ एक पैमाना बन कर फ्लैशबैक में गुजर जाते हो...  हां कहानियां वही हैं, सड़क।पर चलते हुए  साथ भागमभाग की, दोसे के अंदर के आलू गायब  होने की  ओर नारियल पानी पीते वक्त स्ट्रॉ फेंकने की मगर तुम अब सिर्फ एक प्रोप बन जाते हो... हल्की हल्की बूंदों में मिट्टी की सोंधी महक चीखती है  उस ओर खींचती है खिड़कियों के  भूले बिसरे पर्दे में वो तमाम झलकियां मगर कहीं भी तुम नहीं सिर्फ तुम्हारा नाम एक प्रोप....

नींद भी ओर चैन भी

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इश्क़ में नींद उड़ जाती है ओर चैन भी ये बहुत के मुंह से सुना था। पता नहीं ये वाला इश्क़ कौन सा होता है मुझे तो इतनी नींद आती है कि शायद इश्क़ का स्कोप ही नहीं बचता। बहुत दिन पहले किसी ने मुझे भस्मासुर कहा सिर्फ इसलिए कि मैं 8 बजे शाम में ही सो गई थी। अब कैसे बताएं कि हम बिहार के जिस गांव से हैं वहां तो 8 बजे रात हो चुकी होती थी। लोग खाना खा कर चूल्हे की आग भी बुझा चुके होते थे।  हालांकि हमारे गांव में 4 बजे सुबह सुबह इतनी चहल पहल हो जाती है जितनी दिल्ली में 11 बजे तक भी न होती।  वहाँ तो पौ फटते ही किसान अपने खेतों की ओर बढ़ जाते ओर घर की औरतें राख से चूल्हा लीप कर कम काज की शुरुआत कर चुकी होती। गाय बैल को सानी पानी  देना, स्कूली बच्चों के लिए नाश्ता ओर टिफिन पैक करना सब इसी वक़्त होता ओर साढ़े छह बजे तो हम लोग स्कूल भागते होते थे। देश के पूर्वी हिस्से में सब कुछ जल्दी जल्दी होता है सुबह भी ओर शाम भी । तब कहा पता था 4 बजे सुबह उतने की आदत दिल्ली में इतनी बोरिंग लगने लगेगी।  अब तो सुबह 2 घंटे का समय इतना ज्यादा फ्री लगने लगता है। कभी उठ कर किचन में जाती हूं तो ल...

ब्लॉग या व लॉग

बहुत दिनों के बाद जब वापस कलम उठाई तो लगा जैसे बीच में एक सदी गुजर गई है। एक्चुअली शुरुआत ही गलत हो गई मैने कलम नहीं उठाई। मैने कंप्यूटर ऑन किया ओर स्क्रीन पर कीबोर्ड के सहारे लिखना शुरू किया । अब कलम नहीं थम्ब है अंगूठा जिससे आप लिखते होते हैं अपने फोन पर। कंप्यूटर या लैपटॉप तक भी जाने की जहमत कौन करे। सच पूछो तो मेरी गर्दन के दर्द का  सारा झमेला इन अंगूठा के बीच दबे उस मोबाइल का किया धरा है। लेकिन सुबह के पांच बजे उठकर टेबल चेयर पर बैठ जाऊं ओर लैपटॉप निकाल कर लिखने लागू क्या मै इतनी कर्तव्यपरायण जागरूक इंसान हो सकती हूं ? हाहाहाहा  ऐसा होता तो वो जो एम ए पत्रकारिता का कोर्स मैने 2007 में डिप्लोमा करने के बाद सोचा था वो अब तक पूरा हो जाता। हर बार एम ए का फॉर्म भर कर, फीस भर कर बड़े उत्साह के साथ शुरू तो जरूर करती हूं मगर फिर में बीच में कुछ ऐसा लगता है कि जिंदगी की बागडोर हाथ से फिसलती नजर आने लगती है।  वैसे बात लिखने की हो।रही थी । मै सवेरे सवेरे इतनी।सेल्फ क्रिटिसिजम का शिकार नहीं होना चाहती। छुट्टी का दिन है, प्रोंतो ऐप से सफाई कार्यक्रम का निपटारा तय हो चुका ओर यस मै...

बेतकल्लुफ

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 चलो हटो घटा नभ की मुलाकातों का जिक्र बहुत हो गया  फूल भी चुन लिए तुमने गुलाबों का हिसाब भी बहुत हो गया अब दाल बनाते हैं तुम जरा तड़के का इंतजाम करो ये इश्क़ नहीं रोजमर्रा की जिंदगी है चलो ऑफिस जाओ ओर काम करो

राह में

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आरज़ू तो यही थी कि  मुकम्मल इश्क़ मिले या ख़ुदा  मगर बीच में आ मिले अनगढ़ राह के पत्थर से तुम...  न तुम्हे इश्क़ आता है न ख़ुदाई 

यहां पर बस शान्ति शांति है

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मार धाड़, ट्रैफिक हड़ताल, भीड़, चोर, पुलिस ओर कुछ बवाल भी टीवी, रेडियो चीख चीख पूछ रहे सवाल भी  हम मगर ऑफिस जाएंगे  यहां पर बस शान्ति शांति है...  शेयर गिरा, सोना उछला, चांदी गई तरी पार सब्जी दूध गायब गायब हो गए बंद है बाजार  छोड़ दो स्कूल अब बोर्ड ओर इम्तिहाँ  हम मगर ऑफिस जाएंगे  यहां पर बस शान्ति शांति है  बच्चे भूखे जंतर मंतर पर, नेता सारे टूर पर डंडा लेके भागी पुलिस, खूब मचा दी भगदड़ साधु संत सम्हाले कुर्सी, जनता सारी रोड पर हम मगर ऑफिस जाएंगे  चाय पियेंगे , फाइल बनाएंगे  यहां पर बस शान्ति शांति है...

मन नहीं भरता

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जिंदगी एक प्यास बन कर रह गई... बचपन में जब ये गाना सुनती थी समझ नहीं आता था! क्यों प्यास बन कर रह गई भाई इतना पानी है हर जगह जहाँ जाके पीना हो पी लो! एक ग्लास से मन नहीं भरे तो चार ग्लास पी लो! ओर घर में दूध दही भी तब खूब हुआ करता था । पानी से मन नहीं भर रहा तो दो चार ग्लास दूध ही पी लेते थे। अब ऐसा क्या मन कि इतने के बाद भी न भरे? मन ही है कोई बैल का पेट थोड़े है ! ओर इंसान का पेट तो दो चार रोटी खा के भी भर जाता है।    इंसान के पेट से एक बात याद आ गई। गाँव में मजदूर जब भी हमारे घर काम करने आते थे तो माँ चूल्हा जलाती थी। बात उतनी पुरानी नहीं है कि रसोई में चूल्हा ही जले। मगर गेस चूल्हा घर के खाने के लिए, दो चार लोगों के लिए बनाने के लिए काफी माना जाता था या गेस्ट आये तो उनके लिए चाय बनाने के लिए। शुरू शुरू में सब ऐसा ही करते थे। जिस दिन ज्यादा मेहमान आ गए तो बस मिट्टी वाला चूल्हा ही जोड़ते थे । तो मजदूर जब भी आयें उनके लिए रोटियों का महल बनता था । महल इसलिए कि वो एक साथ 20-25 रोटी तो खा ही लेते थे। तो माँ उनके लिए मोटी  मोटी रोटियां बनाती थी वो भी हाथ से। चाहे क...

मेरे हिस्से का आसमान

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दूध ओर रोटी

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दूध ओर रोटी, कुत्ता ओर मजदूर, ज्यादा फर्क कहां है इनमें!  कुत्ता ------- व्यक्ति की शान माना जाता जिसे गोद में उठाए चलते हैं लोग उसकी आंखों की चमक में  खोजते हैं अपना वैभव ओर करते हैं इसके सहारे  अपनी विलासिता का प्रदर्शन!  कुत्ता ---------- दूध का उपभोक्ता है स्तर की पहचान देता है कार में बैठा रहता है दम दबा कर.... और रोटी-------??? खुराक एक मजदूर की भूख से बिलबिलाए पिचके पेट पपोले होठों पर जीभ फेरते  गड्ढे में धंसी आंखे जिसकी चमक उठती हैं ----------- रोटी देखकर ! जिसे पाने की आशा में चल पड़ता है गिरती पड़ती बोरी को पीठ पर सम्हाले मज़दूर....! मजदूर -------- जिसके साथ बंधी होती है बच्चों की तड़प महीने भर से रोके हुए है अपने हाथों को नहीं फैलाते किसी के सामने उन्हें भूख मिटाने को निहारते हैं स्वाभिमानी बच्चे  बोझ उठाते दूर जाते हुए अपने मजदूर पिता को मांगते नहीं किसी से भीख रोटी की खोज में ! रोटी --------- स्वप्न है उनका सौंदर्य, मान ओर  चिथड़े में झलकता स्वाभिमान भी सचमुच फर्क है दूध ओर रोटी में  बहुत बहुत फर्क है....

ghar jaisa

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Muddaton baad ghar sa laga tha Kisi ka khayaal Magar khayaal hi tha...@gunjanpriya

कलम ही साथी अब

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मुझे लगता है मेरे अंदर बहुत खालीपन है जो किसी के आने जाने से नहीं भरता बहुत सारे शब्द उस खाली महल में गूंजते रहते हैं दीवारों से टकरा टकरा कर शब्द जिन्हें वाक्य में बदलने की जरूरत है वाक्य जो कहानियां बन कर  किसी के पास जाना चाहते हैं तो क्या हुआ  हर एक दस्तक उन कहानियों के लिए न हो  कलम ही सही  सुनेगी सब ओर पहुंचाएगी भी दूर बैठे किसी अजनबी तक  जिसके खालीपन को भरने को  मेरे शब्दों की जरूरत हो तो चलो वापस उन कहानियों की तरफ जो तुम्हे  मुझसे सुननी है  ओर मुझे  सिर्फ तुम्हारे लिए कहनी है कलम तुम हथियार नहीं सफ़ीना हो  इस सफर ओर हर अगले सफर की साथी मेरी कलम मेरी हर कहानी अब तुम्हारी ओर हर उस अजनबी की जिसे शब्दों की सचमुच जरूरत हो

सपनो का इश्क़

सपनो का इश्क़  औरतों को इश्क़ चाहिए एकदम मुकम्मल पूरा पैकेज, टॉल डार्क हैंडसम सिंड्रेला सपनो का प्रिंस चार्मिंग   यही तो सिखाया जाता है बचपन से  कहानियों में, किताबों में मां दादी ओर नानी की बातों में भी ससुराल जाना तो कर लेना मन की अपने घर जाना तो सब मिल जाएगा पर भूल जाती हैं औरते  मर्द भी वही आधी अधूरी  हकीकत के सपने देख बड़े होते हैं आएगी बीबी तो दिखाना अपने नखरे बीबी आयेगी तो सारे काम करवा लेना अपने ज्यादा बीबी की वकालत करेगा  तो जोरू का गुलाम बन जाएगा  बीबी को सिर पर मत चढ़ा  ओर इस तरह औरत ओर मर्द  झूठे फरेब भरे सपनो के बीच झूलते हुए एक ही छत के नीचे बने रहते हैं दो प्रश्नचिन्ह हतप्रभ से जवाब ढूंढते सपनो ओर खौफ के बीच दूरियां जरूरी हैं सोच कभी अपना नहीं पाते सपनो का इश्क़ सिंड्रेला से मिलने से पहले   ओर दीवारों के बीच उलझ जाता है किसी कोने में घुट जाती है सिंड्रेला की आवाज

पढ़ी लिखी औरतें

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अकेले ही

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मैं हर उस जगह अब घूम आऊंगी जहां जहां  ना जाने का मलाल है मुझको जहां जहां जाने के लिए  तेरे साथ की जरूरत रही कि तुम कभी फुर्सत से प्लान करोगे कि फिर तुम ये नहीं कहोगे  कि  मैने अकेले ही देख ली क्यों मैने देख लिया है अब तुम्हारे सपनों में न सेशल्स था कभी  न ध्रुवीय रोशनियां  न कोलोराडो न ग्रैंड कैनियन  न पिरामिड ओर  न उगते हुए ओर  आधी रात के सूरज ये सब सिर्फ मेरे ही दिमाग का फितूर है मुझे खुद ही नापने है  अपने सपनो की मंजिले अकेले ही

oh you

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Every sorrow every pain  reminds me of you Oh you... The sea of tears  Your memories bring Then a sigh comes Any pain is less indeed...

बेचारे लड़के क्या करें

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लडके अब नहीं चाहते मा बाप के साथ रहते हुए पढ़ाई करना बाल बनकर शेविंग करके कॉलेज जाना एक शहर में रहकर नौकरी करना मां की कल्पना के अनुसार एक आदर्श बहू ढूंढना वो चाहते हैं साथ पढ़ी लिखी मॉडर्न प्रोग्रेसिव स्त्री जो उनके साथ कदम से कदम मिला कर चल सके ऑफिस, क्लब ओर सड़क पर मगर घर जाने पर घूंघट में मां के पांव छू सके दादी काकी नानी के आशीर्वाद लेने ओर दिल जीतने में माहिर हो जरूरत आने पर दस लोगों का भोजन बनाने में उसके चेहरे पे शिकन न आए मगर बच्चों को पैदा करने सम्हालने ओर स्कूल भेजने में जिम्मेदारी शेयर करने न कहे दोहरी जिम्मेदारियां उठाने का अहसान न जताए क्योंकि नौकरी करना उसका शौक है और बाकी सामाजिक जिम्मेदारियां अनिवार्य लड़की अपने पति की दी हुई स्वतंत्रता का आभारी रहे कि उसने मातृत्व ओर गृह मंत्रालय के साथ अर्थव्यवस्था में भी उसे शामिल होने की स्वतंत्रता दी है बस लड़के समझ नहीं पाते ये पढ़ी लिखी लड़कियां इतना कुछ पाकर भी खुश क्यों नहीं हैं पितृसत्ता के साए में पले बढ़े दुलारे लड़के ये समझ नहीं पाते कि लड़कियां अपना आसमान अलग क्यों ढूंढ रहीं ...

अपने देश के प्रवासी

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हम जड़ से उखड़े हुए अपने ही देश में प्रवासी लोग सरकारी नौकरी ओर आवास पाकर  खुशी जाहिर करना चाहते हैं  मगर सामने जो लोग हैं वे हमे नहीं पहचानते उनके लिए सिर्फ फैलाने ब्लॉक के पहले तल्ले में बसे सरकारी ऑफिसर जो हर 3- 4 साल में  तबादले में चले जाते हैं हम वहां के मालिक नहीं, किरायेदार भी नहीं अरे नहीं आप अपने आवास में   रह सकते हैं मगर कोई परिवर्तन नहीं कर सकते  आगे की दीवार बढ़ा नहीं सकते  ओर पीछे की बालकनी में गमले नहीं लगा सकते  हमारे लिए अब अपना कहने के लिए कोई जगह नहीं छुट्टियों में गईं पहुंचने पर अक्सर  जाने पहचाने लोग अब भूलने से लगे हैं या बचपन में साथ खेले चचेरे भाई ओर बहन भी  हमारी तरह कहीं दूर जा बसे हैं काका काकी ओर पड़ोस वाली भाभियां अब बूढ़े हो चले हैं उनके बढ़ते चश्मे ओर मंद पड़ती यादाश्त में ऐसा कोई चेहरा नहीं बचा जो दस साल बाद हम उन्हें याद आ जाएं शहर के मकान पर अपना नाम  लिखवा लेने के बाद भी हम वहीं हैं अच्छा वो बिहारी फैमिली हमारे आधार कार्ड ओर वोटर आईडी भी बदल चुके हैं अब पीछे जाने का कोई रास्ता हमने छोड...

थोड़ा वक्त लगेगा

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कुछ दिन ओर चुभोगे तुम खामोशी के बीच बार बार  आंसुओं का एक रेला सा आंखों में न आकर गले में अटकता सा नीचे से ऊपर तक  सिर्फ बंगाल की खाड़ी की तरह खारा फिर सब ड्राई... वक्त ब्लॉटिंग पेपर है सुना है सब सोख लेता है वादे, कसमें, वफ़ा, बेवफा... शिकवे ओर शिकायतें भी हावड़ा ब्रिज से गुजरते वक्त  अटकोगे अचानक तुम भी इस मजाक पर खुद ही हंसोगे हम सब हर बार खुद को थोड़ा थोड़ा खो देते हैं ये कहने के बावजूद  कि इश्क़ का ये मंजर पसंद नहीं आया बाजार है, लेट्स मूव ऑन, आगे चलो समेट कर खुद को तुम्हे ओर वक्त को  चलना तो मुझे भी है,  थोड़ा अजीब हूं थोड़ा ओर वक्त लगेगा...

इक्कीसवीं सदी के दुर्लभ वादे

मुझे वो कुछ अलग सा लगा मगर ये झूठ था उसकी बातों में कुछ नया सा था मगर ये भी झूठ था  तमाम बातों के बीच उसकी आंखों का नाम होना झूठा था वो गहराइयां वो वादों की फेहरिस्त ओर आखिरी मुकाम होने की ख्वाहिशें ये मंजर नया था मगर झूठा ही था  फिर भी सच था वो वक्त.... जिसको जिया गया सैकड़ों मील की दूरियों में स्क्रीन पर उड़ती परछाइयों ओर तैरते शब्दों के बीच सब नया था उस वक्त मगर ओर ये भी एक नायाब बात है इनकी अहमियत सिर्फ मिलेनियल बता पाएंगे  वे 90 का प्यार ढूंढते 21वीं सदी की क्रूरता में भटकते लोग तुम क्या जानो 21वीं सदी में ये वादे भी बहुत दुर्लभ होते हैं क्योंकि जेन ज़ी से प्यार वफ़ा वादे जैसे खुशनुमा छलावे भी ऐ आई ने छीन लिए हैं  उनके पास हैं चैट जीपीटी के रेडीमेड उत्तर  जिनमें जज़्बात नहीं मशीनी बात होती हैं सिर्फ 

वर्ष 2025 में नारी समानता

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वर्ष 2025 में नारी समानता बहुत लोग मानने लगे हैं  हिंदुस्तान में  नारी समानता आ गई हैं हालांकि ये अलग बात है  अब भी रोज रोज   पिट जाती हैं बेटियां, बहुएं ओर माएं  पुरुषों के सामने जुबान खोलते पढ़ने, बाहर जाने ओर कमाने का अधिकार मांगते हुए  अब भी   अखबार के हर दूसरे पन्ने पर  रसोई गैस का सिलेंडर फट रहा  अब भी फुटबॉल खेलते हुए बेटियां  मिट्टी में गाड़ दी जाती हैं कि  समाज   उनके पिता को बेटी की कमाई पर पलने वाला न कह दे  अब भी तलाकशुदा बेटियों से  ज्यादा अच्छी अपने ससुराल से अर्थी पर निकलने वाली  बेटियां ही मानी जाती हैं अब भी सुप्रीम कोर्ट के दिए  संपत्ति के अधिकार पर  अटक जाती हैं बेटियां  मायके से रिश्ता खत्म होने के डर से मगर सोशल मीडिया में जरूर आ गई हैं  बहुत सारी क्रांतियां दूर तक दिखता है सबको   ...........नीला ड्रम हां वो।नीला।ड्रम   ओर वो एक आध किस्से   जहां औरतों ने भी अपराध किए हैं मर्दों के खिलाफ ओर यहीं पर ओर छुप जाती हैं सा...